मंगलवार, 26 जून 2018

आपात काल के कडवे अनुभव

 1975 के आपात काल (इमरेजेंसी) के कडवे अनुभव चार दशक से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद आज भी चुभते हैं। पत्रकारिता में नौसिखिया होने के कारण कई बातें आसानी से हमारे  पल्ले नहीं पडती थी। तब मैं सहपाठी नवीन  शर्मा  और हमसे वरिष्ठ   सीता राम खजूरिया के साथ  शिमला से प्रकाशित  दैनिक समाचार पत्र में काम करता था। हिप्र  यूनिवर्सिटी  से अर्थशास्त्र में एमफिल की पढाई भी कर रहा था। 26 जून की सुबह समाचार पत्रों की सुर्खियों में छपा  देश  में इमरजेंसी लग गई है और विपक्षी दलों के शीर्ष   नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है। हमारा समाचार पत्र निकल चुका था और हम इस खबर को मिस कर गए थे। सुबह कॉफी हाउस का माहौल एकदम बदल चुका था। तब  शिमला में माल रोड स्थित कॉफी हाउस पत्रकारों और नेताओं की बैठक हुआ करती थी और सारी ताजा सूचनाएं वहां मिल जाती। उस दिन पहली बार लगा लोग एकाएक सहमे-सहमे से  हैं। हमें अभी इमरजेंसी की भयावहता का अंदाजा नहीं था मगर यह सूचना मिल चुकी थी कि  शांता कुमार, दौलत राम चौहान समेत जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) और राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ के शीर्ष   नेता गिरफ्तार हो चुके थे और अन्य नेताओं की धर-पकड जारी थी । अब समझ में आया कि लोग-बाग क्यों सहमे हुए हैं। अपरांह दफ्तर पहुंचे तब पता चला आपात काल क्या होता है। आजाद भारत मेें पले- पाले  मुझे तब समझ में आया मेरी माता  को कितना मानसिक क्लेश  झेलना पडा होगा। पिताजी स्वत्रंतता सेनानी थे। आए दिन गिरफ्तारियां देते। आपातकाल के साथ ही सेंसरशिप लग चुकी  था। दफ्तर में सरकारी नुमाइंदे (लोक संपर्ककर्मी) धमक चुके थे और बता रहे थे क्या छापा जाए और क्या नहीं। इस मामले वे खुद बेहद कन्फूज्ड थे। कभी कहते इसे छापो, फिर कहते इसे मत छापो। संपादकीय अखबार की आत्मा होती है और अगर इसे निकाल दिया जाए तो अखबार बेजान हो जाता है।  इसे  भी उन्हें  दिखाओ। दो-एक दिन भारी दुविधा में गुजरे और फिर निर्णय लिया गया जब सब कुछ सेंसर ही होना है तो क्यों न  सरकारी विज्ञप्तियां ही छापी जाएं। एजेजियों में आपातकाल से पहले वाली दनदनाती खबरें आनी बंद हो गई थी । नतीजतन, अखबार बंद होने की कगार पर पहुंच गया। इस दौरान सीआईडी का एक आदमी मुझसे मिलने भी आया  और खंगालने  लगा कि क्या  मैं आनंद मार्ग  से संबंधित हूं। आनंद मार्ग  पर अब तक प्रतिबंध लग चुका था।  मैैं सन्न रह गया। मेरा आनंद मार्ग से दूर-दूर का कोई संबंध नहीं था। मैने पूछा आपको कैसे पता चला मैं आनन्द मार्गी हूं। सीआईडी कर्मी बोला आनंद मार्गी की डायरी में आपका नाम दर्ज  है। यह भी कोई बात हुई कि डायरी में मेरा नाम मिलने से मैं आनंद मार्गी हो गया। पत्रकार होने के नाते मेरा नाम कई संगठनों की डायरी में हो सकता है। तब मुझे नेक सलाह दी गई कि इमरजेंसी में वाद -विवाद के लिए कोई जगह नहीं होती है, बस सरकार का डंडा चलता है। काफी समय तक  अपनी  गिरफ़तारी  का इन्तजार करता  रहा पर बच गयाहै।  एम फिल के लिए हमें विष्वविधालय के तत्कालीन कुलपति डाक्टर आर के सिंह ने प्रेरित किया था। डाक्टर सिंह वास्तव में महान शि क्षक थे। अक्सर चुपचाप किसी भी क्लास में बैठकर  प्रोफेसर्स  के  शिक्षण का जायजा लेते। कैंपस में मंडराते छात्रों के पास जा-जा कर उन्हें लाइब्रेरी में पढने की नेक सलाह देते।  गरीब छात्रों की हर तरह से मदद करते। शैक्षणिक जगत में उनका बडा सम्मान था। मुझे एक बार इंटरब्यू के लिए अहमदाबाद के इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मेंनेजमेंट (आईआईएम) जाना था। पहली बार अहमदाबाद जा रहा था, इसलिए मुझे रहने की चिंता सता रही थी। मैने डाक्टर सिंह से अपनी दुविधा बताई। उन्होंने तुरंत आईआईएम के डीन के नाम चिठ्ठी लिखी और मेरे रहने की कैंपस में ही व्यवस्था हो गई। इंटरव्यू में आए अन्य  अभ्यर्थियों  को इस बात पर बडी हैरानी हुई थी। आपातकाल में डाक्टर सिंह को चलता कर दिया गया और उनकी एक ब्यूरोक्रेट को नियुक्त किया गया। डाक्टर सिंह ने हम सब से वायदा किया था कि एमफिल करते ही हम सब की आसानी से नौकरी लग जाएगी, तब एचपीयू एमफिल षुरु करने वाली देष की एकमात्र दूसरी यूनिवर्सिटी थी। मैं पहले ही अटैंपट में पास हो गया मगर डाक्टर सिंह नहीं थे और मैं अध्यापक नहीं बन सका। आपातकाल में संजय गांधी की तूती बोलती थी। इमरजेंसी में ही हिमाचल के निर्माता डाक्टर वाई एस परमार को पद छोडना पडा था। उन्होंने संजय गांधी की नाराजगी मोल ले थी।   परिवार नियोजन के साथ-साथ लोगों पर बहुत ज्यादतियां हो रही थी मगर किसी की मजाल नहीं थी, इन्हें छापे। जैसे ही इमरजेंसी खत्म हुई अखबारों में इन ज्यादतियों की बाढ आ गई। इसके बाद तो इतिहास बना। पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस का सुपडा साफ हो गया। उत्तर प्रदेश  की 85 की 85 सीटें  कांग्रेस हार गई। मगर कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। आपातकाल और सेंसरशिप  का सबसे मुखर विरोध भाजपा की पूर्वज जनसंघ नेताओं ने किया था। इसी  आपातकाल की वजह से जनसंघ लुप्त हो गई  और  भाजपा का जन्म हुआ। अब उसी भाजपा के राज में असहिष्णुता  चरम पर है।