चीन ने डोकलाम विवााद की आड लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय वार्ता का सुझाव देकर नया पैंतरा फेंका है। चीन के भारत में अंबेसडर लुओ झाओहुई ने सोमवार को दिल्ली में एक संगोश्ठी में यह सुझाव दिया। श्रीमान लुओ झाओहुई का कहना है कि भारत और चीन को आपसी सहयोग का दायरा और व्यापक करके पाकिस्तान को भी इसमें षामिल करना चाहिए। भारत और पाकिस्तान 2017 से षंघाई सहयोग संगठन में पहले ही एक साथ हैं। लुओ झाओहुई के अनुसार अगर चीन, रुस और मंगोलिया त्रिपक्षीय वार्ता कर सकते हैं तो भारत, पाकिस्तान और चीन क्यों नहीं? चीन यह बात भली-भांति भारत को पाकिस्तान के साथ विवाद सुलझाने में किसी तीसरे पक्ष का दखल कतई स्वीकार नहीं है। अमेरिका भी कई बार भारत और पाकिस्तान के बीच दखल की पेषकष कर चुका है मगर भारत ने इसे हर बार खारिज कर दिया। षंघाई सहयोग संगठन मूलतः आर्थिक और सैन्य सहयोग का अंतरराश्ट्रीय मंच है और इसमें द्धिपक्षीय विवादास्पद मुद्दों के लिए कोई जगह नहीं है। पाकिस्तान और भारत का कष्मीर को लेकर विभाजनोपरांत का विवाद है। पूरा कष्मीर भारत का अभिन्न अंग है मगर इसका काफी बडा हिस्सा पाकिस्तान ने हथिया रखा है। चीन, पाकिस्तान के अनन्य मित्र होने का दम भरता तो है मगर इसके पीछे इसकी विस्तारवादी मंषा काम कर रही है। चीन पर विष्वास करना खतरनाक साबित हो सकता है। हिंदी-चीनी भाई-भाई कहते-कहते 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। इस हमले के फलस्वरुप चीन ने पष्चिम सेक्टर के लद्दाख में अक्साई चिन का लगभग 35,000 वर्ग किलोमीतटर क्षेत्र हथिया लिया था और तब से भारत का यह क्षेत्र चीन के कब्जे में है। भारत के जख्मों पर नमक छिडकते हुए पाकिस्तान ने 1963 में अपने अधिकृत कष्मीर की षक्सगाम घाटी का लगभग पांच हजार वर्ग मील इलाका चीन के सुपुर्द कर दिया था। चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेष के तंवाग इलाके पर अपना हक जता रहा है। 1962 में चीन ने तंवाग पर कब्जा कर लिया था मगर यह इलबताका मैकमोहन लाइन के अंदर पडने के कारण चीन ने इसे खाली कर दिया था। चीन हालांकि मैकमोहन लाइन को नहीं मानता है मगर इसके बावजूद अंतरराश्ट्रीय द्बाव में उसने यह इलाका खाली कर दिया था। तवांग सामरिक रुप से भारत और चीन दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके पष्चिम में भूटान और पूर्व में तिब्बत है। चीन, भारत को अक्साई चिन के बदले में कई बार तवांग मांग चुका है मगर भारत हर बार इस तरह की सौदेबाजी से बचता रहा है। पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर की ग्लिगित-बल्तिस्तान पर भी चीन की नजर है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियार इस इलाके से गुजरता है। भारत इस गलियारे का भी मुखर विरोधी है और इसके गिलगित-बल्तिस्तान से गुजरने क्षुब्ध है। यह इलाका बृह्द कष्मीर का हिस्सा है। पिछले माह (मई मे)ं पाकिस्तान ने गिलगित बल्त्स्तिान को पाकिस्तान का पांचवा प्रषासनिक क्षेत्र बनाने के लिए गिलगित-बल्तिस्तान आर्डर 2018 पारित किया था। भारत ने इस पर कडी आपत्ति जताई थी और चीन ने कहनह्ा था कि यह मामला दो पडोसी मुल्कों के बीच का है और वह इसमें दखल नही देगा। तब चीन ने कष्मीर समस्या को भारत और पाकिस्तान के बीचतान “ऐतिहासिक बैगेज“ बताते हुए इसे द्धिपक्षीय वातचीत के जरिए सुलझाए जाने की उम्मीद जताई थी। पाकिस्तान और भारत के बीच कष्मीर और आतंकी हिंसा में पाकिस्तानी की सक्रिय भूमिका के अलावा कुछ बहुत ज्यादा बचा नहीं है और जब तक इन दोनों मसलों का तसल्लीबख्ष हल नहीं निकलता है, दोनों के बीच सहयोग की कोई गुजाइंष नहीं है। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की कडुवाहट इतनी तल्ख है कि तीसरे पक्ष के लिए इसका अनुमान लगाना भी असंभव है। चीन की विस्तारवादी चीन और फितरती पाकिस्तान पर तो वैसे ही भरोसा नहीं किया जा सकता।
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