एक जमाने में जन्नत माने जाने वाली खूबसूरत कश्मीर घाटी अब “नर्क“ से भी बदतर बन गई है। हिंसक हमले, मुठभेड, प्रदर्शन और कर्फ्यू तो घाटी की राजमर्रा की बात बन चुकी है। सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंक आतंकियों की सहायता करना अलगाववादियों की फितरत है। सुरक्षाकर्मियो को देखते ही पत्थर बरसाए जाते हैं। ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है। चीन और पाकिस्तान में अगर सैनिकों पर पत्थर फैंके जाते, तो दोषियों को कडी से कडी सजा मिलती। अलवाववादियों और पत्थरबाजों को पालने -पोसने और पुचकारने का काम भारत में ही हो सकता है, चीन-पाकिस्तान में नहीं। आए रोज की हिंसक वारदातों और फिर कर्फ्यू लगने से बच्चों की पढाई पर बहुत बुरा असर पडा है। स्थानीय पर्यटन और उधोग-धंधे चौपट हो गए हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों के दौरान कश्मीर घाटी में स्कूल और कॉलेजिज 60 फीसदी से भी ज्यादा कार्य दिवस पर बंद रहे हैं। इस साल स्थिति मे कोई सुधार नहीं आया है। स्थानीय लोगों को सुरक्षा मु्हैया कराना तो दीगर रहा, सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान बचाना भी मुश्किल हो रहा है। सुरक्षाकर्मियो पर अब ग्रेनडों से हमला किया जा रहा है। सोमवार को कश्मीर के आतंक पीडित शोपियां जिले में ग्रेनेड हमलों में 4 पुलिसकर्मी और 12 नागरिक घायल हो गए। शनिवार को आतंकियों ने श्रीनगर में अलग-अलग स्थानों पर ग्रेनेड फेंककर 4 जवान और 6 लोगों को जख्मी कर दिया था। शुक्रवार जुमे की रोज श्रीनगर में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस (सीआरपीएफ) की जीप की चपेट में आने से एक युवक की मौत हो गई थी और दो अन्य गंभीर रुप से घायल हो गए थे। भीड द्वारा सीआरपीएफ वाहन पर हिंसक आक्रमण के बाद यह हादसा पेश आया। रमजान माह होने के कारण सरकार ने संघर्ष विराम की घोषणा कर रखी है। इस दौरान सुरक्षाकर्मी अपनी तरफ से गोलीबारी नहीं करते हैं और “ऑपरेशन ऑल आउट“ को फिलहाल स्थगित किया गया है। मगर इस संघर्ष विराम से घाटी में अमन-चैन तो लौटा नहीं मगर आतंकियों को खूब आजादी मिली हुई है। रिपोर्ट के अनुसार मई माह में कश्मीर में 20 युवा आतंकी संगठनों में भर्ती हुए है। यह सिला इस माह भी बद्स्तूर जारी है। दो दिन पहले राज्य के आईपीएस कॉडर के एक पुलिस अधिकारी का यूनानी डॉक्टर भाई आतंकी संगठन में शामिल हो गया । इस साल अब तक 80 कश्मीरी आतंकी सगठनों में भर्ती हो चुके है। पिछले साल 126 युवा आतंकी बने थे। 2010 के बाद यह सबसे बडी संख्या थी। सेना ने माना है कि कश्मीर में सक्रिय 250 आतंकियों मेंसे 120 स्थानीय आतंकी दक्षिण कश्मीर में डेरा जमाए हुए हैं। सेना सीमाओं की सुरक्षा कर सकती है, दुश्मनों के दांत खट्टे कर सकती है, आतंकियों से लड सकती है मगर युवाओं को आतंकी बनने से नहीं रोक सकती। यह काम सियासी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है मगर सियासी नेता हैं कि अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने और सत्ता का सुख भोगने में मशगूल हैं। लोगों का दुख-दर्द बांटने से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। जम्मू-कश्मीर में सतारूढ पीडीपी-भाजपा सरकार इस बात की मिसाल है। दोनों राजनीतिक दल वैचारिक और सामरिक तौर पर एक-दूसरे से कोसों दूर है। महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पार्टी अजगाववादियों के करीब है और लगातार बातचीत में उन्हें शामिल करने की पैरवी करती है। पीडीपी की पहल पर ही केन्द्र सरकार रमजान माह में संघर्ष विराम पर सहमत हुई है। सहयोगी भाजपा इससे उलट अलगाववादियों से सख्ती से निपटने और अलगाववादियों के “ तुष्टिकरण' के सख्त खिलाफ है। दो विपरीत दिशाएं सता में रहकर भी नहीं मिल सकती। इससे सिर्फ अराजकता ही पनपती है। कश्मीर में यही हो रहा है। बहरहाल, सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती यही है कि युवाओं को आतंकी संगठनों में शामिल होने से कैसे रोका जाए और उन्हें सेना अथवा पुलिस में भर्ती होने के लिए कैसे प्रेरित किया जाए?
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