चारा घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने चारा घोटाले पर हाई कोर्ट के इस फैसले को पलट दिया है कि एक अपराध के लिए बार-बार मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। चाईबासा मामले में झारखंड के हाई कोर्ट से पांच साल की सजा पाने के बाद बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री एवं राश्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव अन्य मामलों में राहत पाकर चैन की सांस ले रहे थे मगर देश की शीर्ष अदालत ने उन्हें तगडा झटका दिया है। हाई कोर्ट के फैसले को बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपियों पर अलग-अलग मामलों में मुकदमा चलाने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले में देर से अपील करने के लिए फटकार भी लगाई है। 1990 से 1997 के दरम्यान मुख्यमंत्री रहते हुए बिहार में पशुओं के लिए चारा मुहैया कराने की आड में सरकारी ट्रेजरी से बार-बार भारी रकम निकाली गई थी और इसे डकार लिया गया था। रहस्समयी चारा घोटाले का जाल बेहद जटिल है और इसे तोडते-तोडते जांच एजेंसियों के भी पसीने छूट गए थे। लालू प्रसाद यादव के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगननाथ मिश्र भी चारा घोटाले में आरोपी हैं। मामले की जांच कर रहे सीबीआई के तत्कालीन संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास की भी यही राय थी कि सरकारी ट्रैजरी से बार-बार पैसा निकालना अलग-अलग अपराध है और इसके लिए अलग-अलग आपराधिक मामले चलाए जाने चाहिए। बिहार में चारा घोटला 1973 से बदस्तूर चल रहा था। 1985 में बिहार वेटनरी एसोसिएशन ने पत्रकार सम्मेलन बुलाकर पहली बार “ चारा घोटाले“ चलाने वाले माफिया का सार्वजनिक भांडाफोड किया था। 1990 में माफिया ने बिहार वेटनरी एसोसिएशन पर ही कब्जा कर लिया। इससे क्षुब्ध एसोसिएशन के पूर्व पदाधिकारियों ने घोटाले से जुडे दस्तावेज जुटाकर भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी समेत राज्य के टॉप नेताओं क सामने प्रस्तुत किए। इस दौरान मामला मीडिया में उछला और बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इसकी लपेटे में आ गए। अतंतः उन्हें इस्तीफा देना पडा। चारा घोटाले ने लालू प्रसाद के राजनीतिक कैरियर को खासा बाधित किया है। इसी के कारण उन्हें जेल जाना पडा। पांच साल की सजा भी हुई। इसी वजह उन्हें अपने सबसे बडे प्रतिस्पर्धक नीतिश कुमार से समझौता करने पडा और विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाना पडा। चारा घोटाले ने बिहार की राजनीति को भी खासा प्रभावित किया है। नीतिश कुमार से गठबंधन टूट जाने के बाद भाजपा राज्य में कमजोर हुई है और वह फिर से जनता दल (यू) को “चारा“ डाल रही है। महागठबंधन की सरकार बनने के बावजूद नीतिश कुमार लालू प्रसाद के बीच सब कुछ सामान्य नहीं है। नोटबंदी पर प्रधानमंत्री की प्रशंसा और पटना प्रकाशोत्सव समारोह के दौरान मंच पर स्थान नहीं मिलने से लालू प्रसाद नीतिश से क्षुब्ध हैं तो राजद के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन द्वारा नीतिश कुमार को “परिस्थितियों का मुख्यमंत्री“ बताए जाने से दोनों दलों के रिश्ते तल्ख हुए हैंे। भाजपा नीतिष कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को अवसरवादी, विवशता का महागठबंधन बताकर इसे तोडने की हर संभव कोशिश कर रही है। सच यह है कि सता में आने के लिए नीतिश कुमार ने लालू प्रसाद से गठबंधन तो कर लिया है मगर वे आज तक इसको लेकर सहज नहीं हो पाए हैं। मन से वे अभी भी भाजपा के ज्यादा करीब हैं। और उन्हें राजद और भाजपा मेंसे एक को चुनने को कहा जाए, वे भगवा पार्टी को ही चुनेगे। लालू प्रसाद न केवल सजायाफ्ता नेता है, अलबत्ता परिवारवाद को बढाने में सबसे आगे है। नीतिश कुमार परिवारवाद के सख्त विरोधी है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से महागठबंधन पर फिलहाल कोई फर्क न पडे मगर देर-सबेर इसका टूटना तय माना जा रहा है। अवसरवादी राजनीति की जुगाली ज्यादा देर तक नहीं चलती।
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