पहली मई से देश में रीयल एस्टेट एक्ट ( रीयल एस्टेट रेगुलेशन एंड डवलपमेंट एक्ट-रेरा) के लागू होते ही “सपनों” का घर खरीदने वालों को राहत मिलने की उम्मीद की जा सकती है। लिखा-पढी के बावजूद बिल्डरों की मनमानी पर अब तक कोई अंकुश नहीं लग पाया है। गृह निर्माण में अनावश्यक बिलंब और तय समय पर घर का कब्जा नहीं देने की शिकायतें आम हैं। कई बार बिल्डर पूरा पैसा लेकर भी तय समय पर घर को तैयार नहीं करते हैं। घर खरीदने वालों को इससे दोहरी मार पडती है। घर खरीदने के लिए उपभोक्ता बैंक से लोन लेता है और अगर उसे समय पर कब्जा नहीं मिले तो उसे दोहरा वित्तीय बोझ उठाना पडता है। बैक ऋण की किश्त भी देनी पडती है और साथ में किराए के घर में रहने के लिए रेंट भी देना पडता है। इसे दोहरे वित्तीय बोझ से अक्सर उपभोक्ता टूट जाता है। देश की कानून प्रकिया बेहद खर्चीली, लंबी और “अंधी“ होती है और इसमें आम आदमी को तुरंत न्याय नहीं मिल पाता है। बिल्डर इसी स्थिति का फायदा उठाते हैं। रीयल एस्टेट एक्ट के लागू होने से पहली बार घर खरीदने वालों को कानूनी ताकत मिली है। लेकिन अभी भी इस एक्ट की राह में कई अवरोधक है। रीयल एस्टेट एक्ट एक तरह से मॉडल एक्ट है और केन्द्र द्वारा पारित एक्ट को लागू करना है या न करना , इसका पूरा दारोमदार राज्यों पर है। इसकी सबसे प्रमुख वजह यह है कि भूमि (लैंड) राज्य के अधिकार क्षेत्र (स्टेट सब्जेक्ट) में है और इसको लेकर किसी भी कानून के लिए राज्य की स्वीकृति अथवा सहमति अनिवार्य है। अब तक केवल सात राज्य- उत्तर प्रदेश , ओडीशा , गुजरात, बिहार, आंध्र प्रदेश , महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश - ही इस एक्ट को अधिसूचित कर पाएं हैं। केन्द्र चंडीगढ समेत पांच केन्द्र शासित और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए एक्ट को अधिसूचित कर चुका है। इस स्थिति के दृष्टिगत जाहिर है जिन राज्यों (22) ने अभी तक इस एक्ट को अधिसूचित नहीं किया है, वहां के उपभोक्ताओं को इस कानून का कोई लाभ नहीं मिल पाएगा। इतना ही नहीं कुछ राज्यों ने बिल्डरों की मदद करने की गर्ज से इस एक्ट के कुछ प्रावधानों को ही नरम कर दिया है। इस तरह अगर रीयल स्टेट एक्ट को सम्रग रुप में लागू नहीं किया जाता है ,तो इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाएगी। एक्ट के तहत घर के खरीदार, बिल्डर और एस्टेट एजेंट के लिए स्पष्ट नियम बनाए गए हैं। प्रत्येक बिल्डर और प्रापॅटी एजेंट को राज्य रेगुलेटरी ऑथारिटी के पास 30 जुलाई तक पंजीकरण करवाना अनिवार्य है। बिल्डर को खरीदार से ली गई रकम का 70 फीसदी एक अलग खाते में जमा कराना होगा और इस पैसे को केवल निर्माण के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकेगा। एक्ट के तहत सबसे बडी राहत वाला प्रावधान यह है कि बिल्डर को प्रोजेक्ट में किसी भी तरह का बदलाव (यूनिट बढाने-घटाने) करने के लिए 70 फीसदी खरीदारों की सहमति जरुरी होगी। एक्ट के तहत दोषी बिल्डर को 3 साल की कैद और जुर्माना की सजा हो सकती है। घर खरीदने के बाद पांच साल में किसी भी तरह की स्ट्रक्चरल खामी को दुरुस्त करना भी कानूनन अनिवार्य है। एक्ट के लागू होने के बाद बिल्डर को कारपेट एरिया के हिसाब से ही खरीदार को बेच पाएंगें। बहरहाल, एक्ट की सीरत और नीयत निसंदेह नेक है मगर अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि जिन बिल्डरों ने पहले से ही लोगों को चूना लगा रखा है, उनका क्या होगा। एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसके अलावा अगर को बिल्डर बीच में ही प्रोजेक्ट को छोड देता है या भाग जाता है, पीडितों को कौन राहत देगा और उन्हें किस तरह से कंपन्सेट किया जाएगा? खरीदार की तुलना में बिल्डर ज्यादा ताकतवर होता है। कानून में खरीदार के हितों के लिए रेगुलेटरी कदम का न होना इस एक्ट को अप्रभावी (दंतहीन) बना सकता है।
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