कश्मीर के होनहार आर्मी अफसर लेफ्टिनेंट उमर फैयाज की बर्बरतापूर्ण हत्या ने घाटी में व्याप्त असुरक्षा के माहौल को उजागर किया है। छुट्टी पर अपने रिश्तेदार की शादी में शरीक होने आए युवा फौजी अफसर को आतंकियों ने पहले समारोह से अगवा किया, फिर उन्हें तडपा-तडपा कर मार डाला। युवा लेफ्टिनेंट पिछले साल दिसंबर में ही सेना में शामिल हुआ था। 27 साल के अरसे में पहली बार आतंकियों ने घर में घुसकर कश्मीरी अफसर को अगवा करके उसकी बर्बरतापूर्ण हत्या करने का दुस्साहस किया है। कश्मीर में आतंकी और अलगाववादी युवाओं को सेना में भर्ती नहीं होने देने की धमकियां देते रहे हैं। तेईस वर्षीय फैयाज ने आतंकियों की नहीं सुनी, और वे सेना में भर्ती हो गए। इसीलिए आतंकियों ने उन्हें मार डाला। कश्मीरी युवाओं को डराने के लिए ही आतंकियों ने यह कायराना हरकत की है। युवा सैनिक अफसर की जघन्य हत्या से राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल होने वाले युवाओं का हत्तोसाहित होना स्वभाविक है। इस घटना से यह संदेश भी जाता है कि हिंसा की धू-धू करती लपटों से सुरक्षा बल अगर अपने अफसर तक को बचा नहीं पाए, आम आदमी की सुरक्षा तो भगवान भरोसे ही रहेगी। कश्मीरी में लंबे समय से भारी तादाद में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है। इसके बावजूद आतंक और हिंसा का ताडंव बदस्तूर जारी है और हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर होते जा रहे है। आम लोगों की मौत, गोलीबारी, प्रदर्शन , बंद और पत्थरबाजी रोजमर्रा की बात हो गई है। एक तरफ सुरक्षा बल गोलियां बरसाते हैं तो दूसरी तरफ नौजवान पत्थरबाजी करते हैं। और इसमें आम आदमी बुरी तरह से पीस रहा है। स्कूल और कालेज साल में आधे समय से भी ज्यादा समय तक बंद रहते है। राज्य आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले शैक्षणिक सत्र में स्कूलों में दसवीं और बाहरवीं कक्षाओं का बमुश्किल पचास फीसदी सिलेबस पूरा हो पाया। पूरे साल घाटी में स्कूल चार माह तक ही भी पढाई नहीं करा पाए। आए रोज के बंद के कारण हस्तशिल्प उधोग, पर्यटन पूरी तरह चौपट हो चुका है। आम आदमी को भुखमरी की नौबत आ चुकी है। जुलाई में आतंकी बुरहान वानी के सुरक्षा बलों की मुठभेड में मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी आधी साल तक भीषण हिंसा में सुलगती रही। इस दौरान न तो स्कूल-कालेज खुल पाए और न ही आईआईटी, एनआईटी जैसे उच्च षैक्षणिक संस्थान। इस दौरान 90 से अधिक लोग मारे गए और 15, 000 जख्मी हो गए। सुरक्षा बलों के 4000 जवान भी घायल हुए थे । 53 दिन तक कश्मीर घाटी में कर्फ्यू लगा रहा। इसके बावजूद भी हालात सामान्य तो क्या, लेशमात्र भी सुधर नहीं पाए हैं। केन्द्र और राज्य सरकार दोनों ही कश्मीर की समस्या का कोई फौरी हल तक नहीं ढूंढ पाई है। यहीं नहीं केन्द्र और राज्य सरकार कश्मीर की जमीनी सच्चाई से भी आंख मूंद रही है। सच यह है कि भारत को मुस्लिम बाहुल आबादी वाले राज्य को राष्ट्रीय मुख्यधारा में जोडे रखने के लिए देश को बहुत बडी कीमत चुकानी पड रही है। कश्मीर घाटी के लोग अलगाववादी और आतंकियों को भले ही समर्थन न करें मगर वे अपने बच्चों को आतंक और हिंसा की आग मे जलता नही देख सकते। और कश्मीर की सबसे बडी त्रासदी यही है कि आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच जारी संघर्ष की चपेट में स्कूली बच्चे, छात्र और नौजवान भी आ रहे हैं। इससे युवाओं का भडकना स्वभाविक है। कश्मीर में लंबे समय से सेना तैनात है। कश्मीर की अवाम को यह बात जरा भी पसंद नहीं है। सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी की बढती घटनाएं यही दर्शाती है। लंबे समय तक आंतरिक मामलों में सेना की तैनाती के गंभीर परिणाम हो सकते है। युवा अफसर उमर फैयाज की हत्या से सरकार को अब तो संभल जाना चाहिए।
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