बुधवार, 17 मई 2017

प्रधानमंत्री मोदी के तीन साल

 भारत की जनता ने तीन साल पहले कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के “मौन प्रधानमंत्री“ डाक्टर मनमोहन सिंह की जगह  शेर की गर्जना करने वाले नरेन्द्र मोदी को बडी-बडी उम्मीदों और आकांक्षाओं को लेकर देश  का प्रधानमंत्री चुना था। पााकिस्तान की खडमस्तियों से आजिज आ चुके भारतीय जनमानस को पूरा भरोसा था कि अगर पाकिस्तान कोई भी गुस्ताखी करेगा, शेर  की तरह दहाडने वाला प्रधानमंत्री  दुश्मन  पर इस तरह टूट पडेगा कि दुनिया की बोलती बंद हो जाएगी। मगर इन तीन सालों में सर्जिक्ल स्ट्राइक के सिवा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिससे जनता को लगे दुश्मन  के दांत खटे हुए हैं। देश  का प्रधानमंत्री बनने से पहले  नरेन्द्र मोदी अपने पूर्वाधिकारी डाक्टर मनमोहन सिंह और संप्रग सरकार को पाकिस्तान को “मुंह तोड“ जबाव न देने पर तंज कसा करते थे। तीन सालों में न तो पाकिस्तान की बोलती बंद हुई और न ही आम आदमी के अभी तक अच्छे दिन आए हैं। कर चोरों द्वारा विदेशों  में जमा किया गया कितना काला धन भारत लाया गया, इसका भी कोई लेखा-जोखा नहीं है। और सच यह है कि आम आदमी को इससे ज्यादा सरोकार भी नहीं है। वह तो वायदे मुताबिक अपने खाते में विदेशों  से भारत लाए गए काले धन मेंसे अपने हिस्से में आने वाले धन का आज भी बेसब्री से इंतजार कर रहा है।  तीन सालों में  असहिष्णुता  बढी है। यहां तक कि स्वतंत्र, निर्भीक अभिव्यक्ति और दोतरफा संवाद के सभी  द्धार   बंद कर दिए गए हैं। प्रधानमंत्री अब पत्रकारों को विदेशी  दौरे पर नहीं ले जाते हैं। पत्रकारों को अपने खर्चे पर प्रधानमंत्री को कवर करने के लिए विदेश  जाना पडता है। इसमें कोई बुराई नही है मगर स्वस्थ लोकतंत्र के लिए फ्री-प्रेस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए। अमेरिका में राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप और मीडिया के बीच बढते तनाव के बावजूद व्हाइट हाउस ने अपनी नियमित साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग जारी रखी है। ट्रप से पहले  राष्ट्रपति  लगातार प्रेस  से मुखातिब होते रहे हैं। इग्लैंड में संसद सत्र के दौरान प्रधानमंत्री को प्रत्येक बुधवार को पत्रकारों से मुखातिब होने के लिए उपस्थित रहना पडता है। भारत में ऐसी कोई परंपरा नहीं है  हालाँकि  हमने वहां का लोकतांत्रिक मॉडल अपना रखा है। तीन साल में प्रधानमंत्री मोदी ने  बमुश्किल  एक-आध बार पत्रकारों से बातचीत की है। नियमित प्रेस कॉफ्रेंस तो आज तक नहीं हो पाई है। एक बार चुनिंदा पत्रकारों को “सेल्फी विद पीएम“ के लिए बुलाया गया था। पत्रकारों को सवाल पूछने का आज तक कोई मौका नहीं दिया गया है। संसद में उपस्थित रहने और सांसदों का सवाल-जवाब देने से भी प्रधानमंत्री बचते रहे हैं। मगर लोगों से उनका सीधा संवाद है। जहं सवाल न पूछे जा सकें, ऐसे मंचों पर बोलने में प्रधानमंत्री सहज महसूस करते है। जनता से अपनी “मन की बात“ नियमित रुप से करते हैं मगर लोगों के “मन की बात“ को जानने के लिए  शायद ही प्रयास नहीं किए जाते हैं। तीन साल में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन पर देष प्रधानमंत्री को सुनना चाहता था मगर हर बार मोदी भी मनमोहन सिंह की तरह “ मौन“ ही रहे । इससे  लोकतंत्र कमजोर ही हुआ है। देश  की अखंडता से जुडे कई मसले अभी भी सुलझ नहीं पाएं है। कश्मीर  सुलग रहा है मगर इस मुस्लिम बहुल आबादी वाले राज्य की अलगाववादी सोच के लिए मोदी के पास कोई हल नही है। नक्सल समस्या चरम पर है। समान आचार संहिता का वायदा भी पूरा नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में है मगर “तीन तलाक“ का स्थायी हल समान आचार संहिता लागू होने पर ही निकल सकता है। गो-रक्षा के नाम पर जातीय हिंसा फैलाई जा रही है। तथापि प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता है। और-तो-और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश  कुमार भी मान रहे हैं। अरे भई, यही तो लोकतंत्र है?