शुक्रवार, 5 मई 2017

आधार पर बेआधार तर्क

भारतवासियों को इस महान देश  में रहते हुए  अगर अपने शरीर पर भी मुकम्म्मल अधिकार न हो तो यह बेहद चिंता की बात है। लोगों को इस बात पर गुस्सा आना अथवा चितिंत होना स्वभाविक है क्योंकि यह उनकी निजता (प्राईवेसी) और नागरिक अधिकारों से जुडा मामला है । और अगर इस तरह की बात भारत सरकार के अटार्नी जरनल सुप्रीम कोर्ट में कहें तो मामला और भी ज्यादा गंभीर बन जाता है। बुधवार को  अटार्नी जरनल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट  में आाधार को अनिवार्य बनाए जाने की सरकार की पहल पर  जिरह करते हुए कहा कि देश  में किसी भी व्यक्ति को  अपने शरीर पर मुकम्मल अधिकार नहीं है। सरकार आपको अपने किसी अंग को बेचने से रोक सकती है। यानी सरकार आपके शरीर पर नियंत्रण करने की कोशिश  कर सकती है। देश  के अटार्नी जरनल की इस बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता।  बायोमेट्रिक डाटाबेस के लिए एकत्रित की जा रही जानकारी को लेकर कुछ लोग इन्हीं मुददों पर बेहद चिंतित है। आधार को पैन के लिए अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जिरह के दौरान एक वकील का कहना था कि “मेरी अंगुलियों और आंखों की पुतलियों पर किसी और का कोई अधिकार नहीं हो सकता है। सरकार इन्हें मुझसे अलग नहीं कर सकती “। आधार कार्ड  बनाते समय आवेदक की आंखों की पुतलियों और अंगुलियों के प्रिंट लिए जाते हैं। वकील के इसी कथन पर ही अटार्नी जरनल मुकुल रोहतगी ने सरकार का यह पक्ष पेश  किया था। देश  में इस समय आधार को लेकर जबरदस्त बहस छिडी हुई है। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। सरकार ने हाल ही में आधार कार्ड को पैन (परमानेंट अकाउंट नंबर) से जोडा है। आलोचक कह रहे हैं कि पैन कार्ड  का आधार कार्ड  से जोडना गलत है क्योंकि आधार अनिवार्य  नहीं है मगर पैन कार्ड  टैक्स रिटर्न करने के लिए अनिवार्य  है। आधार के मूल एक्ट (यूनिक आईडेंटिफिकेशन  ऑथारिटी ऑफ इंडिया -यूआईडीएआई) के तहत भी  स्पष्ट कहा  गया है कि  आधार कार्ड  स्वैच्छिक होगा, अनिवार्य  नहीं। भारत के सिवा दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक मुल्क में आधार जैसी कोई सिस्टम लागू नहीं किया गया है। अमेरिका, इंग्लैंड़  और यूरोप के किसी भी देश  में आधार जैसा कोई सिस्टम नहीं है जबकि अमेरिका और यूरोप बहु-नस्लीय (मल्टी-रेसियल) देश  हैं। भारत का बायोमेट्रिक डाटाबेस दुनिया का सबसे बडा डेटा संग्रह है। अभी तक भारत सरकार एक अरब (सौ करोड) से ज्यादा नागरिकों की  आंखों की पुतलियों और अंगुलियों के निशान आधार कार्ड  के लिए जुटा चुकी है। सवा करोड आबादी वाले जिस देश  में मात्र साढे छह करोड लोगों के पास पासपोर्ट  और 20 करोड के पास ही ड्राइविंग लाइसेंस हों, वहां आधार कार्ड लोगों की पहचान का पुख्ता साधन बन सकता है। इससे लोगों को काफी सुविधाएं स्वतः मिल सकती हैं। इस बाते के  मद्देनजऱ   आधार को लेकर व्यक्त की जा रही आषंकाएं निर्मूल नहीं हैं। भारत का भ्रष्ट  तंत्र और लोगों में रातोंरात पैसा कमाने की तेज भूख के चलते  इतने विशाल  डेटाबेस को देखकर किसी के भी मुंह में पानी आ सकता है। इस बायोमेट्रिक डाटाबेस संग्रह के दुरुपयोग की पूरी संभावना है। इस स्थिति में यह डाटाबेस नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रहार कर सकता है। दुनिया की गोपनीय से गोपनीय जानकारी को भी हैक करके उसका दुरुपयोग किया जा रहा है। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि बायोमेट्रिक डाटाबेस संग्रह को हैक नहीं किया जा सकता। समकालीन व्यवस्था  की  विश्वसनीयता  पर कई बार  प्रश्नचिन्ह  लगता रहा है। वैसे भी इंटरनेट के आने के बाद दुनिया में कोई भी जानकारी गोपनीय नहीं रह गई है। आधार कार्ड पैन के लिए अनिवार्य होना चाहिए या नहीं, इसका फैसला देश  की  शीर्ष   अदालत करेगी। फिलहाल, सरकार को आम आदमी की आशंकाएं दूर करनी चाहिए।