जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान से तो आर्थिक मदद मिल ही रही है मगर केन्द्र और राज्य की सरकार भी उन्हें भरपूर मदद दे रही है। उन्हें ”चांदी के चमच” से खिला-पिला कर पाल पोस रही है। दुनिया के किसी भी देश में शायद ही कोई सरकार इस तरह से अपने “दुश्मनो “ को खिला-पिला रही हो। और अब केन्द्र की सुरक्षा जांच एजेंसी (एनआईए) अलगाववदियों को मिल रही बाहरी आार्थिक मदद की जांच कर रही है। एनआईए ने सोमवार को अपनी जांच में खुलासा किया है कि कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को हवाला के जरिए पाकिस्तान से भरपूर मदद मिल रही है। जांच में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि अलगाववादियों को पाकिस्तान के अलावा सउदी अरब, बांग्लादेश और श्रीलंका के रास्ते भी आर्थिक मदद मिल रही है। इस खुलासे से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इससे पहले भी इस बात का खुलासा हो चुका है। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि जम्मू-कश्मीर अलगाववादी नेता सांस भारत की खुली हवा में लेते हैं मगर गीत पाकिस्तान के गाते है। रोटी भारत की खाते हैं, पर अहसान पाकिस्तान का जताते है। राज्य सरकार आतंकियों से अलगाववादी नेताओं को बचाने के लिए उनकी सुरक्षा और यात्रा पर हर साल लगभग 110 करोड रु खर्च करती है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने 2001 से 2012 तक 12 साल में अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा पर लगभग एक हजार करोड रु खर्च किए थे। राज्य विधानसभा में सरकार ने इस बात की जानकारी दी थी। सरकार अलगाववादी नेताओं को सुरक्षा तो मुहैया कराती ही है, उनकी आरामदेह यात्रा और उनके आलीशान होटलों में ठहरने, खाने-पीने की व्यवस्था भी करती है। केद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 2010 से 2015 में पांच साल के दौरान कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था, यात्रा और बोर्डिंग-लॉजिंग पर 560 करोड रु से भी अधिक की राशि खर्च की गई। राज्य के लगभग 600 अलगावादियों की सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर पुलिस के 500 पीएसओ और 950 सिक्योरिटी गार्ड तैनात हैं। जिन अलगाववादियों को पुलिस सुरक्षा मिली हुई है, उनमें 1971 में इंडियन एयरलाइंस का हवाई जहाज पाकिस्तान को हाईजेक करने वाले हाशिम कुरैशी भी शामिल है। अलगाववादी नेता भारत से सुरक्षा पाते हैं मगर गुणगान पाकिस्तान का करते है और भारत को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोडते। हाल ही में अलगाववादियों नेताओं को हिजबुल मुजाहिद्दीन कमांडर जाकिर मुसा की धमकियों के बाद राज्य सरकार ने उन्हें माकूल सुरक्षा मुहैया कराने का आश्वासन दिया है। अलगावादी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें सुरक्षित रखना केन्द्र और राज्य सरकार की विवशता है। इन सब बातों से आजिज आकर जम्मू के एक वकील ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर अदालत से अलगाववादियों को सरकारी मदद एव सुविधाएं बंद कराने का आग्रह किया था। न्यायालय ने सितंबर, 2016 में याचिका को निरस्त करते हुए व्यवस्था दी कि किसकी मदद की जानी चाहिए और किसकी नहीं, यह केन्द्र और राज्य सरकार का विशेषाधिकार है और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। इतना ही नहीं, न्यायालय ने कश्मीरी नेताओं को “अलगाववादी“ कहने पर भी ऐतराज जताया था । बहरहाल, मु्द्दा यह है कि केन्द्रीय जांच एजेंसी अलगाववादी नेताओं के फडिंग की जांच करने के बावजूद उनकी बाहरी और भीतरी मदद रोक नहीं सकती। सरकार तो खुद अलगाववादी नेताओं को पाल-पोस रही है और उनकी हर तरह से मदद कर रही है। इस बात के दृष्टिगत सरकार किस मुंह से बाहर के मुल्कों को अलगाववादी नेताओं को दी जा रहई मदद रोकने की बात करती है। सरकार को पहले अपनी कश्मीर नीति स्पष्ट तौर पर रेखांकित करनी चाहिए। देशद्रोहियों को कैसी सुरक्षा और किस बात की मदद?
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