पंजाब के लोक्ल बॉडीज मिनिस्टर नवजोत सिंह सिद्धू का टीवी पर प्रसारित कॉमेडी शो में जज बने रहना अपने आप में “राजनीतिक कॉमेडी“ शो बनता जा रहा है। क्रिकेटर से राजनेता बने सिद्धू पंजाब में मंत्री बनने के बावजूद “ कॉमेडी शो “ में बतौर जज काम करना जारी रखे हुए हैं। मामला अदालत में पहुंच गया है। यह स्थिति काफी रोचक है कि मंत्रियों के सार्वजनिक आचरण को भी अब न्यायपालिका को तय करना पड रहा है। इसके यह अभिप्राय भी निकाले जा सकते हैं कि देश के सियासी नेता अपने सार्वजनिक आचरण जैसे जाती मुद्दे को भी तय नहीं कर सकते हैं । वीरवार को इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने कहा “ मिनिस्टर अपनी कार्यशैली से जो भी मिसाल पेश करते हैं, लोग उन्हें फॉलो करते हैं। इस बात के दृष्टिगत क्या किसी मंत्री को ऐसा कुछ करना चाहिए, जो उनके काम और इमेज से मेल नहीं खाता हो“? जाहिर है अदालत ने मंत्री नवजोत सिद्ध और उनकी बिरादरी को यह नसीहत दी है कि उन्हें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जो मंत्री की छवि से मेल न खाता हो। पंजाब के एडवोकेट जनरल ने सवाल उठाया था कि मंत्रियों के लिए आचार संहिता को लागू करवाना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, इसलिए इस पर सुनवाई नहीं हो सकती। हाई कोर्ट का कहना था कि मामला जनहित से जुडा है। इसे इस बिला पर खारिज नहीं किया जा सकता कि यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। अब मामला अदालत के फैसले पर टिका है। अगली सुनवाई दो अगस्त को होगी। तब तक नवजोत सिंह सिद्धू को टीवी शो पर काम करने और कमाई करने की पूरी छूट होगी। बहरहाल, सिद्धू के मामले ने मंत्रियों के आचरण से जुडे कई अहम सवाल खडे किए हैं। और सबसे बडा अहम सवाल है,“ भारत में सियासत जनसेवा है या पेशा “। आजादी से पहले राजनीति को विशुद्ध जनसेवा माना जाता था। सच्ची जनसेवा की भावना वाले ही राजनीति में प्रवेश करते थे। जनसेवा के लिए महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरु ने अपनी जमी-जमाई वकालत तक छोड दी थी। और भी अनेक उदाहरण है। भूदान आंदोलन के प्रणेता आचार्य विनोबा भावे और जय प्रकाश नारायण ने जनसेवा के लिए खुशाहल जीवन त्याग दिया था। ब्रिटिश सैन्य अधिकारी की बेटी मैडलिन स्लेड, जो बाद में मीरा बेन के नाम से विख्यात हुईं, ने महात्मा गांधी का अनुयायी बनने के लिए सब कुछ त्याग दिया था। भगत सिंह, राजगुरु और उनके जैसे कई युवक भरी जवानी में देश के लिए खुशी -खुशी फांसी पर चढ गए थे। मगर आजादी के बाद उतरोत्तर यह भावना काफूर हो गई। राज नेताओं ने जन सेवा को पैसा कमाने का जरिया बना लिया। एक बार सांसद अथवा विधायक बनने पर उमर भर के लिए मोटी पेंशन। आयकर मुक्त तनख्वाह, भत्ते और हर तरह की सुविधा। केन्द्र और राज्यों ने अपने कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन देनी बंद कर दी है मगर पूर्व सांसदों और विधायकों को मिल रही है। इन वित्तीय सुविधाओं ने राजनीति को जनसेवा की जगह पेशा बना दिया है। जाहिर है लोग-बाग पेंशन अथवा पैसा कमाने के लिए ही राजनीति में आ रहे हैं। अगर सरकार आज मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को पेंशन और मोटी तनख्वाह और भत्ते देना बंद कर दें , तो अधिकतर नेता “जनसेवा“ से तौबा कर लेंगे। कोई भी जनसेवा पैसे कमाने के आकर्षण से फल-फूल नहीं सकती। इसलिए न कोई संहिता है और न ही आर्दष। इस मामले में नवजोत सिंह सिद्धू अपवाद नहीं है। मंत्री रहते हुए भी उन्हे पैसा कमाने की भूख “कॉमेडी शो “ की ओर खीच रही है। आदर्श आचार संहिता का तकाजा है कि उन्हे मंत्री पद और टीवी शो मेंसे एक को चुनना चाहिए। दोहरा आचरण देर-सबेर उनकी छवि को खराब कर सकता है।
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