सोमवार, 1 मई 2017

कश्मीर में बद-से-बदतर हालात

कश्मीर   की पर्वत श्रृंखलाओं पर से बर्फ पिघलते ही घाटी में हिंसा का तांडव  शुरु हो गया है। हालात बद-से-बदतर हो रहे हैं। वीरवार को कुपवाडा जिले में नियंत्रण रेखा के समीप भारतीय सैन्य कैंप पर फियादीन हमला केन्द्र सरकार के लिए गंभीर चिंता का सबब होना चाहिए। 1999 में सैनिकों पर हमले  शुरु होने के बाद  यह सैन्य ठिकाने पर फियादीन का पहला आत्मघाती हमला है। और सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि पहली बार स्थानीय लोगों ने फियादीनों के शवों को पाने के लिए सैन्य कैंप का घेराव तक किया। इसके  अर्थ हैं कि कश्मीर  की अवाम भी अब चरमपंथियों के साथ हो ली है। कश्मीर  के अवाम का चरमपंथियों के संग लडाकू रोल में शरीक होना आगे चलकर सरकार और सुरक्षाकर्मियों को गंभीर चुनौती पेश  कर सकती है। वीरवार को फियादीन के शवों के लिए सैन्य कैंप का घेराव इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि स्थानीय लोग फियादीनों की पहचान को छिपाना  और सैन्य  शिविर पर हमले की जांच को बाधित करना चाहते थे।  पाकिस्तान की संलिप्तता साबित करने के लिए सेना आतंकियों के डीएनए टेस्ट कराती रही है।  अब तक लोग-बाग सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाजी करके अथवा सुरक्षाकर्मियों को बाधित करके आतंकियों को भगाने में मदद किया करते थे। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा था।  आतंकियों के  शवों को पाने के लिए  सैन्य कैंप का घेराव पहली बार किया गया। यह सुरक्षाकर्मियों के लिए नई मुसीबत खडी कर सकता है। पत्थरबाजी की बढती घटनाओं ने इस भ्रम को भी तोड डाला है कि नोटबंदी ने इन पर रोक लगा दी थी। मोदी सरकार अब तक इस मुगालते में थी कि नोटबंदी के कारण नवंबर के बाद से घाटी में पत्थरबाजी की घटनाएं लगभग बंद हो चुकी थीं जबकि असलियत यह है कि सर्दियों में बर्फबारी के कारण अक्सर पत्थरबाजी की घटनाएं कम हो जाया करती हैं। महिलाओं, खासकर छात्रों  की पत्थरबाजी में बढती भागीदार से सरकार का यह भ्रम भी टूट जाना चाहिए कि कश्मीर  की अवाम केवल पैसों के लालच में सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकती है। कश्मीर  में 9 अप्रैल को श्रीनगर लोकसभाई सीट के लिए कराए गए उपचुनाव के बाद से भडकी हिंसा और तल्ख हो गई है। पत्थरबाजी की घटनाएं बढती जा रही हैं और अब महिलाएं भी भारी संख्या  में सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंकने में आगे आ रही हैं। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। केन्द्र द्वारा 80,000 करोड़  रु का  विशेष आर्थिक पैकेज दिए जाने के बावजूद भी अगर अवाम राष्ट्रीय  मुख्यधारा से नहीं जुड पा रहा है, तो हालात अत्याधिक गंभीर है और मोदी सरकार को स्थिति पर काबू पाने के लिए अविलंब ठोस कदम उठाने की जरुरत है। सेना को भी फियादीन हमलों के प्रति अपनी सुरक्षा व्यवस्था और चाक-चौबंद करनी पडेगी। सुरक्षाकर्मियों पर लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद आतंकी हमले जारी हैं। यह बात भी चिंता का विषय  है कि एक ओर हम पाकिस्तान को सबक सिखाने का दम भरते हैं मगर दुनिया की पांचवे सबसे बडी सैन्य हथियार खरीद करने वाली भारतीय सेना आतंकी हमलों से सैनिकों को सुरक्षित रखने के लिए नए सुरक्षा कवच तक खरीद नहीं पाई है। अगर अमेरिका और चीन की सेना के पास अत्याधुनिक सुरक्षा कवच हो सकते हैं, भारतीय सेना के पास क्यों नहीं? कष्मीर को लेकर मोदी सरकार की  अभी भी कोई कारगर नीति नहीं है। यह बात कई बार प्रमाणित हो चुकी है कि आार्थिक पैकेज देकर  कश्मीर की जनता को लुभाया नहीं जा सकता है। आजादी के बाद से आज तक केन्द्र  कश्मीर  को जितना कुछ दे चुकी है, उतना अन्य किसी भी राज्य को नहीं दिया गया है। जमीनी सच्चाई यह है कि कोई भी पैकेज आम आदमी तक पहुंचता ही नहीं है। अधिकतर मदद  बिचौलिए, भ्रष्ट  नौकरशाही और सियासी तंत्र हडप जाते हैं। इससे कश्मीर  की अवाम के घाव और गहरे होते रहे हैं। इन पर अब मरहम-पट्टी करने की जरुरत है।