देश में “ अलग राजनीति“ करने का दम भरने वाली आम आदमी पार्टी (आप) अपने अस्तित्व के मात्र पांच साल से भी कम समय में बिखराव के मुहाने पर खडी है। नेताओं की अति राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मार्ग दर्शन से वंचित “आप“ का बिखराव आश्चर्यजनक नहीं है। पिछली सदी में अस्सी के दशक मेँ भी इसी तरह का “ प्रयोग“ बुरी तरह से विफल रहा था और तब जनता पार्टी के नाम से बनाया गया कांग्रेस का विकल्प अढाई साल में ही धराशायी हो गया था। तब भी नेताओं की सियासी महत्वाकांक्षाएं, वैचारिक मार्ग दर्शन का अभाव और सत्ता लोलुपता जनसेवा पर भारी पडी थी । सत्ता लोलुप नेता लोकनायक जय प्रकाश नारायण का मार्ग दर्शन और जनसेवा का सार्वजनिक संकल्प भी भूल गए थे। बिहार के दो दिग्गज नेता -नीतिश कुमार और लालू प्रसाद यादव- जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ लडे गए जन आंदोलन की ही उपज है। विडबंना देखिए वही लालू प्रसाद यादव सत्ता के लिए उसी “ भ्रष्ट“ कांग्रेस के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रहे है। चारा घोटाले में लालू सजायाफ्ता हैं और छह साल तक चुनाव नहीं लड सकते हैं। बिहार में परिवारवाद फैलाने में लालू की कोई सानी नही है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव पर आपराधिक मामला चलाए जाने के फैसले के बाद लालू प्रसाद की मुश्किलें और बढ गई हैं। जनता पार्टी और तदुपरांत अस्सी के उतरार्ध में विश्व प्रताप सिंह के मोर्चे की सरकार की विफलता के बाद अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी से कुछ उम्मीदें जगी थी। सबसे बडी उम्मीद थीः सच्ची और ईमानदार राजनीति की मगर यह थोडे ही समय बाद लुप्त हो गई। जनमानस को केजरीवाल से सुशासन और ”अलग सियासत“ की उम्मीद थी मगर आप के विधायक भी औरों की ही तरह निकले और सत्ता के लिए मर-मिटने में मशगूल हैं। मोदी लहर के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की प्रचंड लहर ने भाजपा और कांग्रेस का जिस तरह से सफाया किया था, उससे जनमानस में देश में मोदी को चुनौती देने वाला विकल्प की उम्मीद जगी थी। अब यह भी काफूर हो गई है। आम आदमी पार्टी के इन आरोपों में काफी वजन है कि सत्ताधारी भाजपा हर तरह के जायज-नाजायज और वाजिब-गैर वाजिब हथकंडे अपना कर “आप“ को खत्म करने पर आमादा है। इस बात से “आप“ के नेताओं को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए था मगर ऐसा करने की बजाए आप नेता एक-दूसरे को बर्बाद करने पर आमादा है। सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दलों को लंबे समय तक पापड बेलने पडते है। सडकों पर लडते-लडते पांव में छाले पड जाते हैं। लंबी राजनीतिक लडाइयां लडनी पडती हैं। अरविंद केजरीवाल इस मामले में भाग्यशाली रहे हैं। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में शरीक होकर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने इसे राजनीतिक तौर पर खूब भुनाया। आंदोलन में शरीक होने वाले नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हिलोरे मारने लग पडी। दिल्ली विधानसभा चुनाव से थोडे समय पहले पार्टी बना ली। कांग्रेस और भाजपा के कुशासन से त्रस्त दिल्ली की जनता की दुखती नब्ज पकड ली और पहले ही झटके में बहुमत तो नहीं मिला मगर जैसे-तैसे सता हथिया ली। किसी ने सोचा भी नहीं था, आप ऐसा करिश्मा कर पाएगा। भारत तो करिश्माई देश है। यहां लोकतांत्रिक करिश्मे भी होते रहते है। कांग्रेस और भाजपा की रस्साकशी में फंसी आप सरकार की सरकार पचास दिन में चलती बनी। जनता से ताजा जनादेश मांगा और इस बार जनता ने दिल खोलकर जनादेश दिया। जितना प्रचंड जनादेश , उतनी ही बडी जनाकांक्षाएं। केजरीवाल एंड पार्टी इस कसौटी पर जरा भी खरा उतर नहीं पाए है। और अब “आप“ “बदले की गंदी राजनीति“ से पीडित है। बर्खास्त मंत्री कपिल मिश्रा के आरोप इसी गंदी रिवायत का हिस्सा है। बगैर प्रमाण के आरोप लगाना भारतीय सियासत का संस्कार बन गया है। इससे कोई नहीं बच सकता ।
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