तीन तलाक के मुद्दे पर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीबी) का नया पैंतरा काबिलेगौर है। अब तक तीन तलाक को मुसलमानों की आस्था का विषय बताने वाले मुस्लिम बोर्ड ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में यह कह कर अदालत को भी चौंका दिया कि शरीयत में एक साथ तीन तलाक कहकर वैवाहिक संबंधों को विच्छेद करना अमान्य है। इससे पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में ही कह चुका है कि तीन तलाक की प्रथा भारत में चौदह सालों से जारी है और शरीयत में बाकायदा इसकी अनुमति है। अब वही बोर्ड कह रहा है कि तीन तलाक अवांछनीय प्रथा है और शरीयत इसकी अनुमति नहीं देता है। बोर्ड ने अदालत में यह भी कहा है कि महिलाओं को तीन तलाक न मानने का अधिकार दिया जाएगा और दुल्हन निकाहनामे में अपनी शर्त को भी जुडवाने के लिए स्वतंत्र होगी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसके लिए जागरुकता अभियान भी चलाएगा। काजियों और मौलवियों को इस बारे एडवाजरी जारी की जाएगी। इस प्रथा का पालन करने वालों का सामाजिक बॉयकॉट किया जाएगा। यह सब सुनकर मुस्लिम समाज को निसंदेह अच्छा लगा होगा। देर से ही सही मगर गनीमत है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को महिलाओं के भले की तो सूझी। तथापि, तीन तलाक के खिलाफ अदालती लडाई लडने वाली महिलाएं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इन बातों पर सहज से भरोसा करने के लिए तैयार होंगी, इस पर संदेह है। कारण साफ है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में पुरुषो का दबदबा है और महिलाओं के लिए इसमें कोई नुमाइंदगी नहीं दी गई है। जब तक बोर्ड का कायाकल्प नहीं हो जाता, इससे क्रांतिकारी सुधारों की उम्मीद नहीं की जा सकती। कहावत है “हांथी के दांत, खाने के और, दिखाने के और“। यही स्थिति मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की है। बोर्ड को डर है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने अगर तीन तलाक को असामाजिक और गैर-शरीयत प्रथा ठहरा दिया तो बोर्ड की मुस्लिम समाज में खासी भद्द पिटेगी। मुस्लिम समाज मेँ शिक्षित पुरुष और महिलाएं पहले ही बोर्ड की सामंती कार्यशैली की मुखर विरोधी हैं और अक्सर इसे कटटरपंथियों की बपौती करार दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक पर सुनवाई के दौरान इस प्रथा को “वैवाहिक संबंध विच्छेद की बदतर प्रथा“ करार दे चुका है। सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक की प्रथा को चुनौती देने वाली याची ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एपलिकेशन एक्ट 1937 के सेक्शन -2 को संविधान के चौंदहवें अनुच्छेद का घोर उल्लघंन बताया है। चौंदहवें अनुच्छेद के तहत देश का हर नागरिक कानून की नजर में बराबर है। इस अधिकार को संजीदगी से लागू करने के लिए ही समान आचार संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) की मांग की जा रही है। याची का कहना है कि शरीयत मुस्लिम महिलाओं को कानून में एकसमान हक नहीं देता है। यह कैसा इंसाफ है कि शरीयत में तीन तलाक का हक पुरुष को तो है मगर महिलाओं को नहीं? आश्चर्य इस बात पर है कि कट्टर इस्लामिक देश पाकिस्तान में तीन तलाक पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। इस्लामिक देश अफगानिस्तान, सउदी अरब और मोरक्को ने भी इस प्रथा को प्रतिबंधित कर रखा है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास भी इस बात का कोई जबाव नही है कि अगर पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक देश इस प्रथा को प्रतिबंधित कर सकते हैं, तो भारत में इसे अब तक क्यों नहीं रोका गया? दिसंबर, 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट अपने फैसले में तीन तलाक को असंवैधानिक और मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला बता चुका है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष जस्टिस जेएस केहर की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ जल्द ही तीन तलाक पर अपना फैसला सुना सकती है। जिरह पूरी होते ही 18 मई को अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है।
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