इंटरनेट, विज्ञान एवं उन्नत प्रौद्योगिकी ने भले ही पूरी दुनिया को ग्लोबल विलेज बना दिया हो मगर “ खालिस देसी जज्बा“ आज भी दुनिया में सर चढ कर बोल रहा है। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “मेक इन इंडिया“ का जोर है तो अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का “बी अमेरिका, हायर अमेरिकन“ के विजन का दबदबा है। ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव भी इसी वायदे पर जीता था। और अपने वायदे को अमली जामा देने के लिए उन्होंने सबसे पहले अमेरिकन और विदेशी कंपनियों के लिए “ बी अमेरिकन, हायर अमेरिकन” को अनिवार्य किया। ट्रंप की इसी नीति का परिणाम है कि भारत की अग्रणी आईटी कंपनी इंफोसिस ने मंगलवार को ऐलान किया कि वह अपने अमेरिकन कारोबार के लिए अगले दो साल 10,000 अमेरिकन को हायर करेगी। इंफोसिस दुनिया की अग्रणी आउटसोर्सिंग कंपनियों मेंसे एक है और इसके बाद भारत की अन्य आउटसोर्सिंग कारोबारी भी यही नीति अपनाने के लिए बाध्य हों सकती हैं । भारतीय आउटसोर्सिंस कंपनियों का 60 फीसदी से ज्यादा का राजस्व अमेरिका से अर्जित किया जाता है। अमेरिका में इंफोसिस के प्रतिष्ठित आईबीएम, टैक-30 और लॉकहीड मार्टीन जैसे क्लाइंट है। जाहिर है ट्रंप की नीतियों के कारण ही विदेशी कंपनियों को अमेरिकन को हायर करना पडा रहा है हालांकि अब तक अमेरिका के उद्यमी, उधोगपति, कारोबारी और व्यवसायी स्वदेशी -बाहरी जेसे दकियानूसी सोच को दरकिनार कर केवल प्रतिभा को ही तरजीह दिया करते थे। अमेरिका ने इंफोसिस के इस पहल का स्वागत करते हुए इसे राष्ट्रपति ट्रंप की जीत करार दिया है। इंफोसिस के विदेशों में लगभग 24,000 कर्मचारी है और इन मेंसे 15,000 अमेरिका में एच-1 बी वीजा पर काम कर रहे हैं। जनवरी में राष्ट्रपति पदभार संभालते ही ट्रंप ने पहली अप्रैल सेे एच-1बी के तहत प्रीमियम प्रोसिंसग आवेदन लेने बंद कर दिए । इसके तहत अमेरिकन कंपनियां किसी भी विदेशी को 1225 डॉलर की फीस चुका कर 15 दिन में अपने यहां बुला सकती है। अन्यथा रुटीन प्रकिया में कम-से-कम छह माह और इससे ज्यादा का समय लग जाता है। मगर ट्रंप प्रशासन ने इस सुविधा को बंद कर दिया है। इस साल लगभग 85,000 विदेशियों को इसी सुविधा के तहत अमेरिका लाया जाना था। ताजा स्थिति में यह मुमकिन नहीं है। कोई भी कंपनी इतने लंबे समय तक प्रतीक्षा नहीं कर सकती और इस स्थिति में उसके पास स्थानीय को रोजगार देने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता है। यही ट्रंप भी चाहते हैं। ट्रंप अमेरिकी कंपनियों पर एच-1बी सुविधा का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिकन कंपनियां गैर-अमेरिकी विदेशियों को इसलिए हायर करती है क्योंकि वे सस्ते में मिल जाते हैं। इससे स्थानीय लोगों से अन्याय हो रहा था। और अब अमेरिका की देखा-देखी आस्ट्रेलिया ने भी अपने वीजा कानून कडे कर दिए हैं और हाल ही में 200 के करीब व्यवसाय तुरंत प्रभाव से स्कील्ड लिस्ट से निकाल दिए हैं । आस्ट्रेलिया के इस कदम से विदेशियों, खासकर भारतीयों को अब वहां जाना मुश्किल हो जाएगा। हाल ही के कुछ सालों में आस्ट्रेलिया भारतीयों का पसंदीदा देश बन चुका था। इग्लैंड ने हालांकि अभी वीजा नियम ज्यादा कडे नहीं किए हैं मगर यूरोपियन यूनियन से बाहर आने पर अलग-थलग पडी ब्रितानवी सरकार फिलहाल प्रतिभा को रोककर अपना नुकसान नहीं करना चाहेगी। बहरहाल, ट्रंप की “बी अमेरिकन, हायर अमेरिकन“ की नीति से प्रतिभा से कहीं ज्यादा नुकसान अमेरिकी अर्थव्यवस्था को होने जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का ही आकलन है कि अमेरिका को विज्ञान और प्रौद्योगिकी, तकनीक, अर्थ और यापार में सर्वोच्च बनाने में प्रतिभा के सम्मान वाली नीति का बहुत बडा हाथ है। प्रतिभा किसी देश तक सीमित होकर नहीं रह सकती, अब तक अमेरिका इस नीति को अपनाता रहा है। ट्रंप अगर अमेरिका को महान (ग्रेट) बनाने चाहते हैं तो उन्हें भी प्रतिभा की कद्र करनी होगी।
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