बुधवार (आठ मार्च) को मतदान का आखिरी चरण पूरा होते ही पांच राज्यों में चार फरवरी से शुरु हुआ थका देने वाले चुनाव सपन्न हो गए । 11 मार्च को वोटों की गिनती के बाद चुनाव प्रकिया पूरी हो जाएगी। देश के सबसे बडे राज्य की 403 सीटों के लिए सात चरण में मतदान कराया गया। पंजाब की 117 और उत्तराखंड की 70 सीटों के लिए एक दिन का मतदान कराया गया। उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी को पहले चरण का और 8 मार्च को अंतिम चरण का मतदान हुआ। इस तरह मतदान लगभग पूरे महीने चला। उतर प्रदेश के चुनाव सबसे मह्त्वपूर्ण माने जा रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से मुंह की खाने के बाद इन चुनाव में प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा भी दाव पर है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद अहम। उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार सियासी दलों के लिए कितने अहम हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने लोकसभाई हलके वाराणसी में ही लगातार तीन दिन तक चुनाव रैलियां करते रहे। प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश में चार फरवरी को मेरठ में चुनावी सभा संबोधित करके चुनाव प्रचार की शुरुआत करके कुल मिलाकर 23 चुनाव रैलियां की। सबसे ज्यादा चुनाव रैलियां समाजवादी पार्टी के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने की हैं। मुख्यमंत्री ने 36 दिनों में 221 चुनाव सभाओं को संबोधित किया। इस दौरान राजनीतिक दलों ने उग्र प्रचार किया। एक-दूसरे पर जमकर हमला किया। निर्वाचन आयोग की सख्त आचार संहिता के बावजूद सियासी दलों ने खुलकर धर्म और जात-पात के नाम पर वोट मांगे। बहरहाल, देश में अब इस बात पर भी बहस हो रही है कि क्या चुनाव प्रकिया को इतना लंबा खींचना आवश्यक है। पांच राज्यों की 690 विधानसभाई सीटों के लिए चार जनवरी से ग्यारह मार्च तक लंबी चुनाव प्रकिया चली। लगभग अढाई महीने की अवधि में सरकार के नाम पर कोई काम न हो, यह कैसा लोकतंत्र? पंजाब और गोवा में एक महीने से भी ज्यादा समय तक ऐसी सरकार सत्ता में रहेगी जिसके पास जनादेश नहीं है। अगर इन दोनों राज्यों में सत्तारूढ दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो एक महीने से अधिक समय तक ऐसी सरकार का सत्ता में रहना जनादेश का अपमान है। चार जनवरी को पांच विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा होते ही इन राज्यों में आचार संहिता लागू हो गई और इसके बाद ग्यारह मार्च तक कोई नीतिगत फैसले नहीं लिया जा सका। पंजाब और गोवा को एक महीने से भी ज्यादा समय तक नतीजों का इंतजार करना पड रहा है। इन दोनों राज्यों में चार फरवरी को मतदान सपन्न हुआ था। उतराखंड में 15 फरवरी को मतदान हो चुका है। पंजाब की 117 सीटों और उत्तराखंड की 70 सीटों के लिए अगर एक दिन में मतदान कराया जा सकता है, तो फिर उत्तर प्रदेश की 403 सीटों के लिए भी तीन या चार चरण का मतदान कराया जा सकता है। निर्वाचन आयोग का तर्क है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और संवेदनशील राज्य में मतदान को लंबा खींचना लॉजिस्टिक दृष्टि से अपरिहार्य है। निर्वाचन आयोग का यह कथन मैन्युअल मतपत्रों के जमाने में तो माना जा सकता हे मगर आज के इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन उन्मुख मतदान के दौर में सात चरण का चुनाव भारी लगता है। उन राज्यों के लोगों को क्यों सजा दी जाए जो चार फरवरी को मतदान कर चुके है़? लोकतंत्र में मतदान की भांति मतगणना भी उतनी ही महत्वपूर्ण होतीे हैं। मतदान और मतगणना में अधिक फासला देर-सबेर कई तरह की समस्याएं खडी कर सकता है। एक माह से ज्यादा समय तक एवीएम मशीनों (मतपेट्टियों) की सुरक्षा बंदोबस्त मतदान केन्द्रों पर सुरक्षा इंतजाओं से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। इंटरनेट के जमाने में लोगों को लंबा इंतजार करने की आदत नहीं रह गई है। निर्वाचन आयोग और सरकार को इस मामले पर विचार-विमर्श करना चाहिए।
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