अमेरिका में मात्र दस दिन के भीतर तीन भारतीयों पर नस्लीय हमले दुनिया के सबसे ताकतवर देश में नस्लीय जहर की उग्रता को बयां करती है। नस्लीय मुद्दों पर चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप के शासन में यह तो होना ही था। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खरबपति व्यापारी ट्रंप ने अपना पूरा चुनाव श्वेत बनाम अश्वेत और “अमेरिकी बनाम अप्रवासी“ जैसे नस्लीय मुद्दों पर लडा। उन्होंने अप्रवासियों और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ खूब आग उगली। इसका खासा असर उनके श्वेत समर्थकों पर भी पडा और अपने नेता की तरह वे भी नस्लीय जहर उगल रहे हैं । यही कारण है कि ट्रंप के चुनाव जीत जाने के बाद अश्वेत और मुस्लिम अभी भी राष्ट्रपति के खिलाफ पूरे अमेरिकी गणराज्य में जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं। ट्रंप के समर्थक भी राष्ट्रपति के समर्थन में सडकों पर उतर आए हैं। इससे ता हिसंक घटनाएं बढ रही हैं । दो दिन पहले शनिवार को केलिफोर्निया के बरकली में ट्रंप समर्थकों और विरोधियों में हिंसक झडपें हुई। वोट के लिए ट्रंप ने मुसलमानों को आतंकी बताते हुए अमेरिका में मुस्लिम समुदाय की एंट्री को फौरन प्रतिबंधित करने का वायदा किया था । राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान, इराक और सीरिया समेत सात देशों के लोगों की अमेरिका में एंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिका में बसे भारतीय समेत अधिकतर एशियाई और विकासशील मुल्कों के लोग परंपरागत डेमोक्रटिक पार्टी के समर्थक रहे हैं मगर इस बार चुनाव प्रचार में हिंदू, सिख और मुसलमानों ने ट्रंप के समर्थन में खुलकर हिस्सा लिया। भगवा पार्टी के समर्थकों ने न केवल अमेरिका में बल्कि भारत में भी ट्रंप के प्रति अपनी निष्ठां जाहिर की। तथापि, पिछले दस दिनो की हिंसक घटनाओं ने अमेरिका में बसे भारतीयो का ट्रंप के प्रति मोह डोल रहा है। दस दिन में तीन भारतीयों को नस्लीय नफरत का शिकार होना पडा है। इन हमलों में एक भारतीय इंजीनियर को मार डाला गया । एक व्यापारी पर घातक हमला किया गया और शुक्रवार को एक सिख को निशाना बनाया गया। तीनों वारदातों के हमलावर श्वेत थे और हर बार हमलावर “ अपने देश वापस जाओ (गो बैक टू युअर कंट्री) चिल्ला रहे थे। अमेरिका में नस्लीय हमले पहले भी होते रहे हैं और “श्वेत बनाम अश्वेत “ की संकीर्ण मानसिकता वहां खासी बलवती रही है। मगर ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद नस्लीय हमलों पर काफी इजाफा हुआ है। मुसलिम महिलाओं के हिजाब उतार लेना, उन्हें अपमानित करना और अश्वेतों के बच्चों का स्कूल से निकाला जाना अथवा उन्हें दाखिला न देना, वाणिज्य और व्यापारिक संस्थाओं में अश्वेतों से बदसलूकी करना और दीवारों पर नसलीय टिप्पणियां अब आम बात हो गई है। अमेरिका मूलतः बहुनस्लीय राष्ट्र है और इससे आगे बढाने और दुनिया का सबसे श शक्तिशाली मुल्क बनाने में में अश्वेतों और अप्रवासियों का बहुत बडा योगदान है। अप्रवासियों ने भी अमेरिका को बहुत कुछ दिया है। 2011 में प्रकाशि त एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में नए स्मॉल बिजनेस का 28 फीसदी वर्क फोर्स अप्रवासियों का है। सिलिकॉन वैली में 2006 से 2016 की अवधि में नए स्टार्ट-अप चालीस फीसदी टैक कंपनियों में कम-से-कम एक डायरेक्टर गैर-अमेरिकी था । केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन अनुसार यूएस नागरिको के लिए जारी अंतरराष्ट्रीय वैध पेंटेट का एक-तिहाई अप्रवासियों को दिया गया है। अमेरिका में श्वेत और अश्वेत के बीच आर्थिक असमानता आज भी बहुत ज्यादा है। 2013 में अमेरिका में प्रति श्वेत (पर केपिटा) वैल्थ 134,200 डॉलर थी तो अश्वेत की 11,000 डॉलर और हिस्पैनिक की मात्र 7000 डॉलर। 1995 में यह असमानता काफी कम थी। यानी असमानता उतरोतर बढती ही जा रही है। इन आंकडों से यह पता चलता है कि अमेरिका में श्वेतों और अश्वेतों से कोई खतरा नहीं है मगर अप्रवासियों को श्वेत खतरा मानते है। 2016 में छह करोड अप्रवासी अमेरिका मे रह रहे थे। श्वेतों का लगता है कि अप्रवासियों से उन पर खामख्वाह का बोझ पड रहा है। बढती आतंकी घटनाओं ने श्वेतों को और ज्यादा असुरक्षित कर दिया है। ताजा नस्लीय हमले इसी असुरक्षा का परिणाम है।
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