सोमवार, 6 मार्च 2017

दिल्ली से चंडीगढ तक आग

दिल्ली यूनिवर्सिटी में भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (एबीविपी) और वामपंथी  आल इंडिया स्टूडेंटस एसोसिएशन (आइसा) के बीच के वैचारिक जंग की आग अब चंडीगढ तक फैल गई है। ठीक दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज कैंपस की ही तरह पंजाब यूनिवर्सिटी चडीगढ में भी पिछले पांच दिन से स्टूडेंटस फॉर सोसाइटी (एसएफएस) और एवीबीपी के बीच सेमिनार में उदार विचारधारी सामाजिक कार्यकर्ता  सीमा आजाद को आमंत्रित करने पर “ जंग" छिडी हुई है। इस सेमिनार में शहीद भगत सिंह के भतीजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह जैसे प्रमुख वक्ताओं को भी आमंत्रित किया गया है । एवीबीपी सीमा आजाद का पुरजोर विरोध कर रही है और एसफएस उन्हें सेमिनार में बुलाने पर आमादा हैं। एसएफएस का कथन है कि यूनिवर्सिटी मुक्त विचारों का मंच होता है जहां हर गंभीर मुद्दे और मसलों पर खुलकर बहस होनी चाहिए। मगर आरएसएस-भाजपा से सम्बद्ध एववीबीपी इससे सहमत नहीं है। शुक्रवार को एवीबीपी ने सीमा आजाद को पीयू में प्रवेश  नहीं करने दिया हालांकि बाद  में  फ़िल्मी  स्टाइल में उन वे  कैंपस में आई  और भाषण देकर चली गई ।  इसके विरोध में वाइस चासंलर के दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे एसएफएस नेता को पुलिस को हिरासत में लेना पडा।  भाजपा की ही तरह एवीबीपी के लिए वे लोग और बुद्धिजीवी  फूटी आंख नहीं सुहाते जो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते है। वह फिर चाहे दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा गुरमेहर कौर हो या चंडीगढ के एसएफएस लीडर दनमप्रीत। 22 फरवरी को दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में जो कुछ हुआ वह बेहद  शर्मनाक है। और इससे भी अधिक  शर्मनाक  कारगिल शहीद की बेटी गुरमेहर कौर की ट्रॉलिग है। गुरमेहर ने “ मैं एवीबीपी से नहीं डरती“ वीडियो जारी क्या किया, बीस  वर्षीय  डीयू छात्रा को "देशद्रोही और प्रदूषित जहरीला दिमाग' बताने की संघ और भाजपाइयों में होड सी लग गई।  केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू से लेकर हरियाणा के स्वास्थय मंत्री अनिल विज तक, भाजपा नेता  इस कद्र गुरमेहर के पीछे लठ्ठ लेकर पड गए कि शहीद की बेटी को दिल्ली छोडकर अपने शहर जालंधर लौटना पडा। छात्रा को बलात्कार तक की धमकी दी गई। इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है? किसी  भी  सभ्य समाज में इस तरह की घटना को सहन नहीं किया जा सकता। यह असहिष्णुता  की पराकाष्ठा   है। भाजपा और भगवा संगठन से जुडे लोग जन गोलबंदी करने में माहिर है। बोलने और मुखर प्रचार करने मैं उनकी कोई सानी नहीं है।  अपने विचारों के लिए हर जगह, हर वक्त  खुलकर बोलने की उन्हें पूरी आजादी चाहिए मगर जो लोग उनके विचारों से सहमत न हों, उन्हें नहीं बोलने देने की भी भगवाधारियों को खुली छूट चाहिए। भगवाधारियों के लिए “अभिव्यक्ति की आजादी“ के मायने भी इसी सांचे में ढले हुए हैं। जो लोग उनके विचारों से सहमत हैं, वे सब सच्चे देषभक्त हैं और असहमति व्यक्त करने वाली सभी “देशद्रोही। और  इन सब को पाकिस्तान भेज देना जाना चाहिए। अपने विरोधियों के लिए पाकिस्तान चले जाने को कहना संघ-भाजपाइयों का तकिया कलाम बन चुका है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी भाजपाई उन सभी लोगों को “पाकिस्तान चले जाने को कहते“ जो तत्कालीन भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते।  आजादी से लेकर अब तक गत सात दशकों में लाख बार इस बात पर बल दिया जाता रहा है कि  असहिष्णुता से किसी भी समस्या का हल नहीं निकलता। लोकत्रंत्र में वाद-विवाद , तर्क-वितर्क, बहस-मुहासिब और पक्ष-विपक्ष के आदर-सम्मान से ही समस्याओं का हल निकाला जाता है। अपने विचार दूसरों पर थोपना और दूसरों के विचारों का अनादर करना लोकत्रंत्र को कमजोर करता है। राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने वीरवार को फिर कहा कि “ असहिष्णुता“ के लिए भारत में कोई जगह नही है। यूनिवर्सिटी ही ऐसी उपयुकत जगह है जहां छात्रों को वैचारिक मतभेदों और ज्वलंत मुद्दों का  वाद-विवाद और तर्क-वितर्क  से हल निकालने की कला सिखाई जानी चाहिए। दुखद स्थिति यह है कि ऐसा करने की बजाए देश  के सियासतदान  छात्रों के दिल-दिमाग को प्रदूषित कर रहें हैं।