मंगलवार, 14 मार्च 2017

ऐसे एक्जिट पोल का क्या लाभ ?

कहते हैं “दूध का जला, छाछ को फंूक-फूंक कर पीता है“। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव पर किए गए एक्जिट पोल के अलग-अलग नतीजे इस कहावत को चरितार्थ करते हैं। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव के एक्जिट पोल निश्कर्शों ने इनकी विष्वसनीयता को खासा झटका दिया था। और अब ताजा एक्जिट पोल के अलग-अलग  निष्कर्ष  इनकी प्रासंगिकता पर ही सवाल खडा कर रहे हैं। एक्जिट पोल सही भी पाए गए हैं और गलत भी। पर सच्चाई यह है कि अधिकतर गलत साबित हुए हैं।  और  इस बार भी पूरी तरह से गलत साबित हुए।  2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के पक्ष में बह रही प्रचंड लहर की  एक्जिट पोल करने वालों को भनक तक नहीं लग पाई थी। इसी तरह बिहार विधानसभा चुनाव में नीतिश  कुमार-लालू प्रसाद यादव के गठबंधन की लहर भी एक्जिट पोल में नही दिखी थी। बिहार और दिल्ली के चुनाव परिणामों में एक्जिट पोल की पोल-पट्टी बुरी तरह से खुल गई थी। वीरवार ( 9 मार्च) को जारी विभिन्न एक्जिट पोल के नतीजों में इतना बडा अंतर था  कि इन पर नजर डालकर जनमानस भ्रमित हो रहा है। मसलन, उतर प्रदेश  में कोई एक्जिट पोल भाजपा को प्रचंड बहुमत दे रहा था  , तो अन्य  उत्तर प्रदेष में त्रिशंकू विधनसभा बता रहे थे । नतीजे एकदम  उलट निकले । भाजपा को  इतना प्रचंड बहुमत मिला जिसकी पार्टी ने भी कल्पना नहीं की थी ।जितने एक्जिट पोल, उतने ही अलग-अलग नतीजे। इसके क्या मायने लगाए जाएं? वैसे एक्जिट पोल भारत में ही नहीं अमेरिका जैसे अति साक्षर और जागरुक देश  में भी गलत साबित हुए हैं। 2016 में सपन्न अमेरिकी राष्ट्रपति  चुनाव के सारे एक्जिट और ओपिनियन पोल गलत साबित हुए हैं।  शुरु से आखिरी तक सभी ओपिनियन पोल डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की जीत को  निश्चित बता  रहे थे मगर नतीजा एकदम  उलटा  निकला। ओपिनियन पोल मे  शुरु से आखिर तक हिलेरी से काफी पिछडे बताए गए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप भारी अंतर से जीते। भारत की अपेक्षा अमेरिका में ओपिनियन पोल की तकनीक कहीं ज्यादा सटीक है और सैंपल चयन और  निष्कर्ष  को कई बार जांचे  परखे  जाते  हैं । अमेरिका की तरह भारत में एक्जिट अथवा ओपिनियन पोल की विधि एक जैसी है मगर लोगों के मनोविज्ञान में बहुत ज्यादा अंतर है। अमेरिका के सैंपल्स में एकरुपता है मगर भारत में विविधता।  अगर सैंपल का चयन सही भी है, अमेरीकी और यूरोप के तरह लोगों में  स्पष्ट  और बेबाक बात करने अथवा  निष्पक्ष  रखने  की प्रवृति नहीं है। भारत में ऐसा  नहीं हैं । लोग बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ और।  भारत में यह मनोविज्ञान काम करता है। विषेषज्ञों  के अनुसार एक्जिट पोल के  निष्कर्ष  तभी सही निकलते है जब सैंपल साइज पूरी तरह से सभी वर्गों की नुमाइंदगी करता हो। भारत में सैंकडों  उपजातियां और विविध संस्कृतियां हैं। इन सभी के लिए सही नुमाएंदगी वाले   सैंपल का चयन आसान नहीं है। वेरिएबल का भी पूरी तरह से ख्याल रखना पडता है। वोट को सीटों में परिवर्तित करने का फॉर्मूला भी एकदम सटीक होना चाहिए। इसले अलावा और भी कई मानदंड हैं, जिन पर  पूरी तरह से खरा उतरने से ही सही  निष्कर्ष   निकल सकता है। अमूमन, मतदाता अथवा सैंपल मतदान को लेकर अंदर की बात बाहर नहीं निकालता। इसी तरह सुबह वोट करने वाली की मानसिकता , दोपहर और  शाम को वोट करने वाले से एकदम भिन्न होती है। इस स्थिति में सुबह वाला सैंपल, दोपहर अथवा  शाम की नुमाइंदगी नहीं कर सकता। अमेरिका जैसे विकसित देश  में मार्जिन ऑफ एरर को कम-से-कम करने के लिए हर चुनाव क्षेत्र में न्यूनतम  बीस हजार सैंपल आवश्यक  माने जाते हैं। मगर भारत में सैंपल की विविधता का ख्याल किया जाए तो यहां एक लाख सैंपल भी कम पड जाएंगे। विभिन्न एक्जिट पोल के अलग-अलग नतीजों की  पृष्ठभूमि  में यही सब कारण हैं।