दार्शनिक एचएल मेनकेन के अनुसार “लोकतंत्र की बुराइयों का उपचार अधिक लोकतंत्र है“। केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार के लिए यह नसीहत मौजूदा परिवेश में प्रासंगिक लगती है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत के 'नशे ' में चूर मोदी सरकार ने गोवा और मणिपुर में भी अपनी सरकार को स्थापित करने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया है। इन दोनो राज्यों में कांग्रेस सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी है और भाजपा दूसरे नंबर पर है। लोकतंत्र का तकाजा है कि सबसे बडी पार्टी को पहले सरकार बनाने का न्यौता मिलना चाहिए और राजभवन में बहुमत की परीक्षा करने की बजाए इसका फैसला विधानसभा में होना चाहिए। मगर गोवा और मणिपुर में इस स्थापित परंपरा का निर्वहन नहीं किया गया। लगभग ऐसी ही स्थिति हिमाचल प्रदेश में 1982 के विधानसभा चुनाव के बाद त्रिशंकू जनादेश से उत्पन्न हुई थी। कांग्रेस और भाजपा को लगभग बराबर की सीटें मिलीं थी और छह निर्दलीय का समर्थन निर्णायक बना हुआ था। दोनों ही दल निर्दलियों के समर्थन का दावा कर रहे थे। राज्यपाल के लिए यह तय कर पाना बेहद मुश्किल था कि निर्दलीय विधायकों का समर्थन किस पार्टी को है। इस स्थिति में राज्यपाल ने निवृतमान भाजपा सरकार को सरकार बनाने का न्यौता दिया और पार्टी द्वारा सरकार का दावा पेश नहीं करने के बाद ही कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आंमत्रित किया गया। तब केन्द्र में इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार थी। गोवा और मणिपुर दोनों राज्यों में कांग्रेस को भाजपा से कुछ ज्यादा सीटें मिलीं हैं। अब तक त्रिशंकू जनादेष की स्थिति में सबसे बडी पार्टी को पहले सरकार बनाने का न्यौता दिए जाने की परंपरा रही है। चालीस सदस्यीय गोवा विधानसभा में कांग्रेस को 17, भाजपा को 13 सीटें मिलीं है। यानी कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत के लिए चार विधायकों का समर्थन चाहिए था और भाजपा को आठ। इसके बावजूद कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर तक नहीं दिया जाना वाकई स्थापित लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। यही स्थिति मणिपुर में है। इस पूर्वोतर राज्य में साठ सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 28 और भाजपा को 23 सीटें मिलीं हैं। मणिपुर में कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए तीन और भाजपा को आठ विधायकों के मदद की दरकार थी। भाजपा ने गोवा की तरह मणिपुर में भी तत्काल अन्य दलों का समर्थन जुटाकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। पार्टी को दोनों राज्यों में सरकार बनाने का हाथों-हाथ न्यौता भी मिल गया। हैरानी इस बात की है कि भाजपा नेतृत्व ने दो छोटे राज्यों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करने में जरा भी विलंब नहीं किया जबकि उत्तर प्रदेश और उतराखंड में अभी तक मुख्यमंत्री का फैसला नहीं हो पाया है। बहरहाल, राजनीतिक अखाडे में भाजपा, कांग्रेस से कहीं ज्यादा दाव-पेंच वाली साबित हुई। कांग्रेस के इतने बुरे दिन चल रहे हैं कि वह गोवा और मणिपुर जैसे छोटे राज्यों को भी संभाल नहीं पा रही है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी के इस फटेहाल स्थिति की ओर इशारा भी किया। कांग्रेस द्वारा गोवा में भाजपा सरकार की ताजपोशी के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी की इस बात के लिए खिंचाई की कि अगर कांग्रेस के पास बहुमत था तो वह सबसे पहले राज्यपाल के पास क्यों नहीं पहुंची। और अगर न्याय नहीं मिला तो पार्टी ने धरना क्यों नहीं दिया? सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कांग्रेस प्रबंधन के दिवालिएपन को उजागर करती है। पार्टी ने राज्यपाल को विधायकों की सूची तक नहीं सौंपी। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए निर्धारित औपचारिकताएं तक नहीं निभाई। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा है कि अगर कांग्रेस ने ऐसा किया होता तो अदालत को निर्णय लेने में आसानीं होती। तथापि, लोकतंत्र में स्थापित परंपराओं का सम्मान सत्ता लोलुपता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। गोवा और मणिपुर में परंपराओं का निर्वहन नहीं किया गया है।
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