पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह से मुंह की खाने के बाद “ इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम)“ को दोष देना “खिसयानी बिल्ली खंबा नोचे“ वाली बात है। इस बात पर बालक भी हंस देगा कि वोटिंग मशीन में हेर-फेर करके चुनाव नतीजों को बदला जा सकता है। आज तक दुनिया के किसी भी देश मैं यह बात साबित नहीं हो पाई है कि “ इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन " में गड़बड़ी की जा सकती है। पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख सुश्री मायावती और अब आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में पार्टी की हार के लिए ईवीएम को दोषी ठहराया है। बुधवार को केजरीवाल ने इस बात पर हैरानी व्यक्त की कि पंजाब में चुनावी बयार तो आम आदमी पार्टी के पक्ष मे थी मगर जीत गई कांग्रेस। यह कैसे हुआ, इसकी जांच होनी चाहिए। केजरीवाल कहते हैं “लोग भले ही मेरा मजाक उडाएं और मुझे ट्रॉल भी किया जाएगा मगर मेरे पास इस बात के प्रमाण हैं कि पंजाब में “आप“ को रोकने के लिए गहरी साजिश रची गई“। कई लोगों ने उनकी पार्टी को वोट दिए मगर उन्हें काउंट नहीं किया गया। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए “आप“ प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेते हुए कहा कि अदालत ने भी कहा है कि ईवीएम फूल प्रूफ नहीं है। इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती भी आरोप लगा चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश में वोटिंग मशीनों से छेडछाड की गई। वोटिंग मशीनों ने भाजपा के सिवा किसी भी दूसरी पार्टी के मतों को स्वीकार ही नहीं किया अथवा मशीनों से छेडछाड करके अन्य दलों के वोट भी भाजपा के पक्ष में चले गए। सुश्री मायावती ने मुस्लिम बहुल हलकों का हवाला देते हुए कहा है कि मुसलमानों के वोट भाजपा के पक्ष में जाएं, तो स्पष्ट है कि वोटिंग मशीनों से छेडछाड की गई है। बहरहाल, अरविंद केजरीवाल और मायावती की इन अनर्गल बातों से देश की निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव प्रकिया की जगहंसाई हो रही है। भारत का निर्वाचन आयोग और इसकी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव प्रकिया का पूरी दुनिया में सम्मान किया जाता है। केजरीवाल से सवाल किया जा सकता है कि अगर पंजाब में चुनाव में हेर-फेर किया गया है तो शिरोमणि अकाली दल क्यों नहीं जीता? इसी तरह अगर उत्तर प्रदेश में भी वोटिंग मषीनों में हेर-फेर हुआ है तो बहनजी की पार्टी को समाजवादी पार्टी के लगभग 21.8 फीसदी वोट से भी ज्यादा 22.2 फीसदी वोट क्यों मिले? इससे यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि अगर उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा ने मिलकर चुनाव लडा होता, तो भाजपा के 39.7 फीसदी से कहीं ज्यादा 44 फीसदी वोट के बलबूते दोनों को भगवा पार्टी से भी ज्यादा प्रचंड बहुमत मिलता। बहुदलीय चुनाव व्यवस्था की यही विसंगति है कि इसमें नाममात्र के अंतर से भी प्रचंड बहुमत मिल जाता है। केजरीवाल की इस बात में वजन है कि आप का वोट शेयर अकालियो को चला गया, इसलिए कांग्रेस जीत गई। पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता में लाने और शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को हराने में बहुत बडी भूमिका निभाई है। पंजाब में कांग्रेस को इस बार पिछले विधानसभा चुनाव के 39.92 से भी कम 38.5 फीसदी वोट मिले मगर सीटें कहीं ज्यादा। इसकी प्रमुख वजह है कि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के अधिकांश वोट आम आदमी पार्टी के पक्ष में चले गए। इस चुनाव में अकाली दल-भाजपा को 25.2 फीसदी और आप को 23.7 फीसदी वोट मिले हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 34,59 और उसके सहयोगी दल भाजपा को 7.12 फीसदी वोट मिलेे थे। आप तब चुनाव मैदान में नही थी और बादल परिवार के बगावती नेता मनप्रीत बादल की पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब केजरीवाल की तरह अकाली दल -भाजपा का कुछ भी बिगाड नहीं पाई थी। केजरीवाल की पार्टी को भले ही पंजाब में स्पष्ट बहुमत न मिला हो मगर उन्होंने वह कर दिखाया है, जो पंजाब के स्थानीय नेता भी नहीं कर पाए। और यह सब निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के कारण ही संभव हो पाया है।
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