मार्च का महीना नौकरी-पेशा लोगों के लिए कर और बचत से जुडी चुनौतियां लेकर आता है। आयकर से बचने के लिए अनिवार्य बचत करनी पडती है और पाई-पाई जोडनी पडती है। उस पर अगर रोज-मर्रा की चींजें महंगी हो जाएं, तो जीना मुहाल हो जाता है। पहली मार्च से नॉन सब्सिडी वाली रसोई गैस के दाम प्रति सिलेंडर 86 रु बढने से मोदी सरकार ने लोगों को महंगाई की कांटेभरी सौगात दी है। इतना ही नहीं बेकों ने ग्राहकों की लूट-खसोट और ज्यादा बढा दी है। बडे और रसूखदार कर्जदारों पर तो बैंको का कोई वश चलता नहीं है, इसलिए छोटे और असहाय ग्राहकों को शुल्क-दर-शुल्क लगाकर लूटा जा रहा है। ताजा सूचना के मुताबकि बैकों ने हर माह चार से ज्यादा ट्रांसक्शन करने पर प्रति निकासी अथवा डेपोजिट पर 150 रु का शुल्क लेना तय किया है। एचडीएफसी बैंक ने तो यह शुल्क वसूलना भी शुरु कर दिया है। सरकार ने तो हद ही कर दी है। रसोई गैस के इतिहास में मोदी सरकार ने बुधवार को गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में आज तक की सबसे बडी वृद्धि की । दो साल में यह लगातार चौथी वृद्धि है। अक्टूबर, 2015 में चंडीगढ-पंचकूला में गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम 507 रु थे और पहली मार्च को इसके दाम 768 रु हो गए हैं। यानी दो सौ फीसदी से भी ज्यादा बढोतरी। लगातार दाम बढाए जाने से उन लोगों को बहुत बुरा लग रहा है, जिन्होंने प्रधानमंत्री के आहवान पर स्वेच्छा से एलपीजी सब्सिडी त्यागी है। सरकार के अपने आंकडे इस बात के गवाह हैं कि अभी भी धनाढय वर्ग एलपीजी सबसिडी ले रहा है और इनमें सांसद और विधायक भी शामिल हैं। इमानदारी से सरकार को कर देने वाले लोगों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि उनके साथ हमेशा अन्याय होता है। एलपीजी और बैंक लेन-देन के अलावा इस तरह की और भी कई सेवाएं है जिन पर सर्विस टैक्स लगाकर आम आदमी पर बोझ डाला गया है। कार इन्सुरेंस में थर्ड पार्टी के रेट बढा दिए गए हैं और सर्विस टैक्स भी। इससे इन्सुरेंस महगी हो गई है। बजट में मोदी सरकार ने आयकर की जो अधिकतम 12,500 रु की राहत दी है, उससे कहीं ज्यादा वह वापस ले रही है। सर्विस अथवा इस तरह के टैक्स अथवा जरुरी वस्तुओं के दाम बढने का सबसे ज्यादा खामियाजा आम आदमी को भुगतना पडता है जिसकी आय उस अनुपात में नहीं बढती जिस अनुपात में महंगाई। पिछले तीन सालों में खाद्यान्न के दामों मे लगातार वृद्धि हो रही है। आम आदमी का पेट भरने वाली दालों की कीमतें उतरोत्तर बढती ही जा रही है। मूंग, तुअर और उडद जैसी महंगी दालें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। नोटबंदी से बेंकों की विश्वसनीयता पहले गिर चुकी है। अब रही सही कसर बैंको के लगातार बढते शुल्कों ने पूरी कर दी है। भला यह भी कोई बात हुई कि सरकार आपको बैंक से अपना ही पैसा निकालने न दें और बैंक इसके लिए आपसे शुल्क वसूले। डीटीएल इंडिया को प्रोत्साहित करने का यहाँ कोई तरीका नहीं है ।इस पर सोशल मीडिया में तंज कसा गया है कि “जो भी बैंक ट्रांसक्शन और महंगे एलपीजी सिलेंडर की नुक्ताचीनी करेगा, उसे देश द्रोही करार दिया जाएगा“। महंगाई डायन की तरह होती है जो किसी को नहीं बख्शती । प्रधानमंत्री ने लोगों से अच्छे दिन लाने का वायदा कर रखा है। मोदी सरकार को सत्ता में आए तीन साल होने जा रहे हैं, अच्छे दिन की परछाई भी तक नजर नहीं आ रही है। लोगों को अभी भी मोदी पर भरोसा है। हाल ही में सपन्न निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव परिणाम यही दर्शाते हैं। मगर मध्य वर्ग का धैर्य जबाव दे रहा है। सोशल मीडिया पर यह प्रतिक्रिया“ हमें और अच्छे दिन नहीं चाहिए। बस रोक दो “अच्छे दिन”। हम ऐसे ही ठीक हैं“, इस बात का प्रमाण है।
शुक्रवार, 3 मार्च 2017
For God Sake, Please Stop " Achche Din", We Don't Want Anymore
Posted on 7:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/






