मोदी सरकार ने पिछडे वर्गों के लिए अनुसूचित जाति एवं जनजातियों की तरह नया आयोग गठित करके देश की करीब 41 फीसदी आबादी को राहत दी है। पिछडे तबके लंबे समय से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) एवं अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) की तरह संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग की मांग कर रहे थे। नेशनल सेंफ्ल सर्वे आर्गेनाइगेशन के अनुसार भारत में पिछडे वर्गों की 40.94 फीसदी आबादी है। इसकी तुलना में अनुसूचित जातियों की आबादी 19.59 फीसदी और जनजातियों की 8.63 फीसदी आबादी है। पिछडे तबकों को अब तक इस बात का मलाल रहा है कि अगर 28 फीसदी आबादी के लिए संवैधानिक दर्जा प्राप्त दो अलग-अलग आयोग बनाए जा सकते हैं तो 41 फीसदी आबादी के लिए कम-से-कम एक सर्व शक्तिमान आयोग क्यों नहीं ? सरकार ने पिछडे तबकों के लिए भी राष्ट्रीय आयोग (नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासिस -एनसीबीसी) स्थापित कर रखा है मगर इस आयोग को राष्टीय अनुसूचित जाति अथवा जनजाति आयोग जैसी पॉवर नहीं है। एनसीबीसी की पॉवर पिछडे तबकों को सूची में शामिल करने अथवा बाहर करने तक ही सीमित है। पिछडे तबकों की शिकायतों और उनके निपटान की पावर इस आयोग के पास नहीं थी। यह पॉ़वर राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को दी गई है और अब तक पिछडे तबकों की शिकायतों का निपटान भी यही (एनसीएससी) आयोग करता है। फरवरी 2004 में अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग से आयोग बनाए जाने के बाद पिछडे तबकों के लिए भी इसी तरह के सर्वशक्तिमान आयोग की मांग ने और जोर पकड लिया था। संप्रग सरकार इस मांग को टालती रही है। सरकार को नए आयोग का संवैधानिक दर्जा संसद से पारित करवाना पडेगा और संविधान में संशोधन करना पडेगा। सरकार ने एक महत्वपूर्णं संशोधन भी किया है। पिछडे तबकों की सूची में किसी वर्ग को शामिल करने अथवा निकालने की पॉवर संसद के हवाले करके सरकार ने खामख्वाह की राजनीतिक आलोचना से बचने का रास्ता निकाला है। अभी तक पिछडा आयोग की सिफारिश पर सरकार अपने स्तर पर यह काम किया करती थी और इस तरह के फैसले को राजनीतिक रंगत दी जाती है। जाटों की आरक्षण संबंधी मांगों को पूरा करना नए आयोग के समक्ष सबसे बडी चुनौती होगी। माना जा रहा है कि हरियाणा में जाटों के मौजूदा आरक्षण आंदोलन को सामने रखकर सरकार ने नए आयोग का बनाने का फैसला लिया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री से वार्ता के बाद जाटों ने दो सप्ताह के लिए फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित कर रखा है। मोदी सरकार ने 41 फीसदी आबादी के लिए संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग का गठन करने के फैसले के बाद अब देष की 70 फीसदी आबादी की आरक्षण की मांग पूरी हो जाएगी। इसके बाद देश की मात्र 30 फीसदी अगडों की आबादी आरक्षण अथवा इस तरह की सुविधा से वंचित रह जाएगी। केन्द्र में सत्ता में आने से पहले तक भाजपा जात-पात अथवा धार्मिक आधार की बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण की पुरजोर वकालत करती रही है और आरक्षण को वोट केचिंग हथियार बताती रही है। सरकार के ताजा फैसले से अगडों का उदवेलित होना स्वभाविक है। 30 फीसदी अगडों के कमजोर लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित क्यों किया जाए और 70 फीसदी पिछडों, अनुसूचित एवं जनजातियों के आर्थिक रुप से संपन्न लोगों को आरक्षण का लाभ क्यों दिया जाए? विभिन्न अध्ययन इस बात के गवाह हैं कि पिछडे, अनुसूचित एवं जनजातियों के कमजोर एव गरीब परिवार को इस बात का ज्ञान भी नहीं है कि उन्हें नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण दिया जाता है। मोदी सरकार के फैसला लोकलुभाना ज्यादा लगता है, व्यवहारिक कम।
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