शुक्रवार, 17 मार्च 2017

सेहतमंद भारत ?

देश  के हर स्कूल में “हैेल्थ इज वैल्थ“ पर निबंध लिखवाया कर यह संदेश  दिया जाता है कि मानव के जीवन में “तंदुरुस्ती“ अनमोल है। स्वस्थ षरीर,  स्वस्थ सोच और स्वस्थ आचरण किसी भी देश  को दुनिया की जन्नत बना देता है। और जिस देश  के लोग स्वस्थ नहीं हैं, वह रहने के काबिल ही नहीं माना जाता। संयुक्त राष्ट्र  द्वारा स्थापित मानदंडों के अनुसार स्वीडन, सिंगापुर और आइसलैंड दुनिया के सबसे ज्यादा सेहतमंद देश  हैं। भारत की रैंकिग काफी पीछे है और वह 180 देशों में 103वें पायदान पर है। हैल्थ और विकास का चोली दामन का साथ है। तेज विकास के तब तक कोई मायने नहीं जब तह यह लोगों के जीवन को खुशाहल और सेहतमंद नहीं बना पाए। आजादी के बाद से सरकार गाहे-बगाहे  राष्ट्रीय  हैल्थ पॉलिसी बनाती रही है मगर यह ज्यादा कारगर साबित नहीं हुई है। आजादी के सात दशक बाद भी देश  के नामी सरकारी अस्पतालों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। दिल्ली के सबसे बडे  प्रतिष्ठाशाली  अस्पताल “एम्स“ में न्यूरो-सर्जरी के जनरल वार्ड  में एडमिशन के लिए एक साल से अधिक समय तक का इंतजार करना पडता है। यहां तक कि प्राइवेट वार्ड के लिए ही कम-से-कम छह महीने का इंतजार करना पडता है। देश  के सरकारी अस्पतालों  में आज भी  एक हजार रोगियों के लिए मात्र एक बैड उपलब्ध की सुविधा तक उपलब्ध  नहीं है । नतीजतन, उपचारधीन बडे अस्पतालों के बाहर खुले आकाश  अथवा बरामदों में अपना इलाज करवाने को विवश  हैं। सवा सौ करोड से अधिक आबादी के लिए कुल मिलकर 35,416 सरकारी अस्पतालों में 13,76,013 बैड है़ं। भारत की 68 फीसदी ग्रामीण आबादी के लिए दो फीसदी भी डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। इसी कारण 70 फीसदी ग्रामीण भी प्राइवेट अस्पताल जाना पसंद करते हैं और 63 फीसदी परिवार सरकारी अस्पताल जाते ही नहीं। देश  में इस समय 460 मेडिकल कॉलेज हैं और इनमें हर साल 63,985 डाक्टर तैयार किए जाते हैं। इसके बावजूद भी  देहातों में काम कर रहे मात्र 18.8 फीसदी डाक्टरों के पास मान्यता प्राप्त डिग्री है और ज्यादातर “ नीम-हकीम, खतरे में जान“ वाले कथित  डाक्टर  हैं। 2016 में  विश्व  स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचऔ) की रिपोर्ट में भारत में उपल्ब्ध स्वास्थय से जुडी बुनियादी सुविधाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। इसमें कहा गया है कि भारत स्वास्थय क्षेत्र  में चीन से काफी पीछे है। एक लाख आबादी के लिए भारत में  80 डाक्टर हैं, चीन में 130। इसी तरह भारत में एक लाख आबादी के लिए 61 नर्सें और दाइयां हैं तो चीन में 96। इन आंकडों से यही निश्कर्श निकलता है कि देश  भले ही अंतरिक्ष विज्ञान में चीन से आगे निकल गया  हो और उसकी ग्रोथ भी तेज हो पर अगर जनमानस को बुनियादी सुविधाएं हीं नहीं मिले । ऐसी उन्नति किस काम की? मोदी सरकार ने बुधवार को 15 साल बाद राष्ट्रीय   हैल्थ पॉलिसी का जो खाका तैयार किया है, उसमें ऐसा कुछ भी क्रांतिकारी नजर नहीं आ रहा है, जिससे गरीब और कमजोर तबकों को अविलंब त्वरित स्वास्थय सुविधाएं मिलनी सुनिष्चिित हो पाएं। इससे पहले भी बाबुओं ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर कई बार राश्ट्रीय हैल्थ पॉलिसी  का खाका तैयार किया है मगर आम जनता को आज भी लंबी कतारों में लगकर उपचार के लिए घंटों इंतजार करने पडता है।  देश  की  70 फीसदी जनता को त्वरित और समयबद्ध स्वास्थय सेवाएं मुहैया कराने का खाका पंचायतों और सबसे निचले स्तर में तैयार किया जाना चाहिए। प्राइवेट अस्पतालों में महंगे से महंगा उपचार कराने वाले बाबु गरीबों और कमजोर तबकों की स्वास्थ्य जरुरतों को ग्राह्य नहीं कर सकते। दुर्भाग्यवश ,  जनता द्वारा चुने गए नुमाइदें लॉमेकर बनते ही गरीब और जरुरतमंदों  को भूल जाते हैं। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी,  वातानुकूलित कमरो में तैयार की गई नीतियां कागजी ही साबित होंगी।