गुरुवार, 23 मार्च 2017

Ayodhya Tangle Can't Be Solved Without Court Intervention

इसे संयोग कहा जाए या उत्तर प्रदेश  के नए मुख्यमंत्री पर “राम लला“ की कृपा, योगी आदित्यनाथ के  पदभार संभालते ही सुप्रीम कोर्ट  ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में दोनों पक्षों से समझौते का रास्ता निकालने को कहा है। मंगलवार को छह साल बाद भारी व्यस्तताओं के बावजूद अदालत ने समय निकालकर भाजपा के वरिष्ठ  नेता सुब्रह्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई की और संबंधित पक्षों को बीच का रास्ता निकालने की सलाह दी। मुख्य न्यायाधीष जस्टिस जेएस खेहर ने कहा “ थोडा दीजिए, थोडा लीजिए और इसे सुलझाने की कोशिश  कीजिए“। अदालत का कहना  था कि धार्मिक भावनाओं से जुडे संवेदनशील  मसलों को मिल-बैठ कर सुलझाया जाना चाहिए“। अदालत को इनमें तभी दखल देना चाहिए जब संबंधित पक्ष इसे सुलझा न सके“। अदालत ने समझौते के लिए 31 तक का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह ने सालों  से लंबित पडे मामले को फिर हवा दे दी है। यह नेक नसीहत ठीक उसी समय आई है जब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि 1992 में बाबरी मस्जिद को ढ्हाने के लिए भाजपा के वरिष्ठ  नेता लाल कृश्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी  और उमा भारती दोषी  है या नहीं। बुधवार को अदालत को इस मामले में फैसला सुनाना था पर न्यायाधीश   आर नरीमन के उपलब्ध नहीं होने के कारण यह वीरवार तक स्थगित कर दिया गया। जस्टिस नरीमन ने तीन मार्च को ही बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई में विलंब पर  असंतोष  व्यक्त किया था। यह रोचकपूर्ण स्थिति है कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट को बाबरी मस्जिद के ढहाने के लिए दोषियों को सजा मुकरर्र करनी होगी तो दूसरी तरफ राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने में मध्यस्था की पहल करनी होगी। बहरहाल, बाबरी मस्जिद विवाद समझौते अथवा बातचीत से हल किए जाने की नाममात्र भी गुंजाइश  नहीं दिख रही है। दरअसल, राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामला धार्मिक भावनाओं से जुडा नहीं है, इस सच्चाई से सुप्रीम कोर्ट भी परिचित है। किसी सम्प्रदाय की आस्था के प्रतीक को ढहाना और उसे वोट के लिए भुनाना विशुद्ध राजनीति है। भाजपा के वयोवृद्ध नेता खुद इस बात को मान चुके हैं कि राम मंदिर के लिए जो आंदोलन उन्होंने चलाया था, वह धार्मिक नहीं, अलबता राजनीतिक था। इसीलिए  इस मसले का आज तक हल नहीं हो पाया है ।  दो पक्षों के बीच किसी तरह के समझौते के लिए यह जरुरी है कि कलह के  मूल बिंदू पर  स्पष्ट   सहमति हो। मगर बाबरी मस्जिद- राम मंदिर मामले में मूल बिंदू पर ही सहमति नहीं है। मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि बाबरी मस्जिद में स्थानीय प्रशासन की मदद से देवी-देवताओं की मूर्तियां 1949  में चुपके से अंधेरे में रख कर इसे विवादित बना दिया गया था। चार दशक बाद  1992 में बाबरी मस्जिद को ही ढहा दिया गया था। जिस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, वह अब मलबे में तब्दील हो चुकी है और इस जगह “राम लला“ का काम अस्थायी मंदिर बनाया गया है । इसी जगह “राम भक्तों“ ने भव्य राम मंदिर बनाने का संकल्प ले रखा है। भाजपा और आरएसएस से जुडे संगठन चाहते हैं कि बाबरी मस्जिद को किसी दूसरी जगह बनाया जाए और मुस्लिम समुदाय विवादित स्थल को राम मंदिर बनाने के लिए छोड दे। मुस्लिम इसके लिए कतई तैयार नहीं है। वस्तुस्थिति  यह है कि समझौते के लिए न तो माहौल  है और न ही जमीन तैयार की गई है। अगर समझौते के लिए मालिकाना हक को आधार माना जाता है, हिंदुओं के साथ न्याय की गारंटी नहीं है और अगर “थोडा लीजिए, थोडा दीजिए“ पर समझौत होता है, तो मुस्लिम समुदाय संतुष्ट  नहीं होगा। अततंः अदालत को ही इस विवाद को सुलझाना पडेगा।