लंदन में ब्रितानवी संसद परिसर के निकट आतंकी हमले की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अमेरिका और आस्ट्रेलिया में नस्लीय हिंसा थमे नहीं थम रही है। अविश्वास और नस्लीय घृणा के इस माहौल से फिर विश्व स्तब्ध है। अमेरिका और आास्ट्रेलिया की ताजा घटनाओं ने विकसित देशों के मूलवासियों में व्याप्त असुरक्षा और नस्लीय मानसिकता को फिर उजागर किया है। रविवार अलसुबह अमेरिका में ओहियो राज्य के सिनसिन्नाटी शहर के एक नाइट क्लब में दो बंदूकधारी ने अंधाधुंध फायरिंग की और इसमें एक व्यक्ति मारा गया और 14 लोग घायल हो गए। आए दिन अमेरिका में हिंसक घटनाएं हो रही हैं । डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद हिंसक घटनाओं में और ज्यादा इजाफा हुआ है। आस्ट्रेलिया में पांच लोगों ने एक भारतीय पर यह कहते हुए हमला किया कि उन्हें भारतीयों की उपस्थित जरा भी पसंद नहीं है। भारतीय मूल के लोगों के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, कनॉडा और आस्ट्रेलिया पहली पसंद रहे हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्था को समृद्ध करने में भारतीय मूल के लोगों की बडी भूमिका रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए माना था कि अमेरिका अर्थव्यवस्था में इंडियन ऑरिजन के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है। आस्ट्रेलिया के मौजूदा प्रधानमंत्री टॉनी एबोट और पूर्व प्रधानमंत्री जुलिया गिलार्ड भी भारतीय मूल के लोगों की अहम भूमिका की तारीफ कर चुके हैं। यही स्थिति कनॉडा और इंग्लैंड की ही है। दुनिया की सबसे बडी स्पेस एजेंसी नासा में तीस प्रतिशत वैज्ञानिक भारतीय मूल के हैं। सिलिकॉन वैेली में भारतीय एक्सपर्ट्स का दबदबा है और दुनिया की बडी कंपनियां बराबर भारतीय विशेषज्ञों को पहली प्राथमिकता देती हैं। सिलिकॉन वेली का तो यहां तक आकलन है कि चीन ने भारतीय प्रतिभा की उपेक्षा करके बहुत बडी गलती की है। अमेरिका, कनॉडा, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों की तरक्की की प्रमुख वजह भी यही है कि इन देशों ने भावनाओं की जगह व्यावहारिकता को ज्यादा प्राथमिकता दी है। तथापि पिछले कुछ समय से विकसित देशों की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ में जो ठहराव आया है और जिस तरह से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर कम हुए हैं, इससे इन मुल्कों में असंतोष और बाहरी लोगों के प्रति आक्रोश बढा है। स्थानीय लोग विदेशों से आने वाले लोगों को हर छोटी-बडी समस्या के लिए जिम्मेदार मानते हैं। इराक और सीरिया की आईएसआईएस और अल-कायदा जैसे खूंखार आतंकी संगठनों की नापाक हरकतों ने अमेरिका और यूरोप के लोगों को और ज्यादा असुरक्षित कर रखा है। इन सब घटनाओं ने सियासी नेताओं के लिए भी स्वार्थी राजनीति की पौध तैयार की ही। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं फ्रांस समेत यूरोप के कई मुल्कों में चरमपंथी नेता “स्थानीय बनाम बाहरी“ को और ज्यादा हवा दे रहे हैं। बहरहाल, कहते हैं जैसे नदी के बहाव को कोई नहीं रोक सकता, वैसे ही प्रतिभा की धमक को भी कोई नकार नहीं सकता,। अमेरिका और आस्ट्रेलिया में चरमपंथी भारतीय प्रतिभा को नहीं रोक सकते। हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। इसी हिंसा ने पूरे मध्य-पूर्व एशिया को लगभग तबाह कर दिया है। सीरिया, यमन और इराक भीषण गुह युद्ध में जलकर बर्बाद हो चुका है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में सिरफिरे लोग निर्दोष लोगों को गोलियों से भून कर और नस्लीय हिंसा फैला कर वही सब कर रहे हैं जो आईएसआईएस, अल-कायदा और लश्कर जैसी आतंकी संगठन कर रहे हैं। फिर उनमें और आतंकियों में अंतर ही क्या है?
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