सजायाफ्ता नेताओं पर चुनाव लडने से ताउम्र पाबंदी लगाने की निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए और इसके लिए अविलंब कानून बनाने की जरुरत है। सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2013 में ही अपने फैसले में सजायाफ्ता नेताओं की संसद अथवा विधानसभा की सदस्यता को अविलंब समाप्त कर दिया था। अदालत ने सजा के खिलाफ अपील करने का हक देने वाले जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के सब-सेक्शन (4) को ही निरस्त कर दिया था। इस सेक्शन के तहत सजायाफ्ता नेताओं को सजा के खिलाफ अपील का हक प्राप्त था। इसी कानून के निरस्त होने पर राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव चुनाव नहीं लड पा रहे हैं। लालू प्रसाद यादव को 2013 में चारा घोटाले में पांच साल की कैद की सजा सुनाई गई थी। सजायाफ्ता होने के बावजूद लालू प्रसाद आज भी बिहार में किंगमेकर बने हुए हैं। निर्वाचन आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि वह संगीन आपराधिक मामलों में सजा पा चुके नेताओं के चुनाव लडने पर ताउम्र पाबंदी चाहता है। सुप्रीम कोर्ट की 2013 व्यवस्था की मूल भावना भी यही है कि सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव लडने पर पूृर्ण पाबंदी होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश , सुप्रीम कोर्ट के पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है । यह अधिकार देश की संसद के पास है । देश के सियासतदान राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त करने की बडी-बडी बातें तो करते हैं मगर अमल में इन्ही तत्वों को सर आंखों पर बैठाते हैं। इसका ताजा उदाहरण बहुजन समाज पार्टी है। बसपा ने उत्तर प्रदेश के कुख्यात माफिया डॉन मुख्त्यार असारी को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी में शामिल कर लिया जबकि 2010 में सुश्री मायावती ने आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने के लिए उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया था। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को लेकर लगभग यही मनोस्थिति अन्य सियासी दलों की भी है। लगभग हर राजनीतिक पार्टी के एक तिहाई नेताओं पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। मौजूदा (सोलहवीं) लोकसभा के 34 फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। 2009 में 30 फीसदी और 2004 में 24 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इन आंकडों से साफ है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की संख्या उत्तरोतर बढती ही जा रही है। दुखद स्थिति यह है कि साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवारों की अपेक्षा आपराधिक पृष्ठभूमि वालों के चुनाव जीतने की पचास फीसदी ज्यादा संभावना रहती है। राजनीतिक दल चूंकि उम्मीदवार का चयन इसी आधार पर करते हैं, इसलिए आपराधिक पृश्ठभूमि वालों को तरजीह दी जाती है। कानूनन, उनके चुनाव लडने पर रोक नहीं होने के कारण राजनीतिक दल आपराधिक पृश्ठभूमि वालों को हाथों-हाथ उम्मीदवार बनाते हैं। इसी जमीनी सच्चाई के दृष्टिगत निर्वाचन आयोग के ताजा सुझाव पर कानून बनाना अपरिहार्य है। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के 1, 2 और 3 के तहत सजायाफ्ता नेताओं की संसद अथवा विधानसभा की सदस्यता को तुरंत निरस्त करने की व्यवस्था है मगर सियासतदानों ने सेक्शन 4 को जोडकर इस व्यवस्था को निष्क्रिय कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार संविधान की 101()3 (ए) और 190 (3) (ए) के तहत संसद को सजायाफ्ता सदस्य की सदस्यता के निलंबन के लिए विधायिका व्यवस्था करने का कोई अधिकार नहीं है। निष्कर्ष यह है कि अगर देश की संसद संविधान का दुरुपयोग करके सजायाफ्ता सदस्यों को कानून सुरक्षा कवच दे सकती है तो उन्हें चुनाव लडने से प्रतिबंधित करने के लिए कानून क्यों नहीं बना सकती। मोदी सरकार अगर अपने स्वच्छ सरकार के वायदे के प्रति वाकई ही संजीदा है तो सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव लडने पर तुरंत रोक लगानी चाहिए।
बुधवार, 22 मार्च 2017
Why Not To Ban Jailed Leaders From Contesting Elections
Posted on 7:52 pm by mnfaindia.blogspot.com/






