गुरुवार, 2 मार्च 2017

India's Growth Rate Intact: Head Scratching Economists And Critics

क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाकई जादुई प्रतिभा रखते हैं? हर बार मोदी कुछ ऐसा कर दिखाते हैं कि पूरी दुनिया स्तब्ध रह जाती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पहली बार अपन बूतेे  स्पष्ट  बहुमत दिलाकर मोदी ने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया था। नवंबर में एकाएक नोटबंदी करके आर्थिक जगत को हिला कर रख दिया था। हाल ही में भारत ने एक साथ 104 सैटेलाइट लांच कर  विश्व  रिकार्ड बनाया है। भारत के इस कीर्तिमान से समूचा  विश्व  स्तब्ध है। अमेरिकी  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के नेशनल इंटेलीजेंस डायरेक्टर नॉमिनी डैन कोट ने सार्वजनिक तौर पर माना है कि वे भारत की इस उपलब्धि से स्तब्ध हैं और अमेरिका को इससे सीख लेनी चाहिए। अब नोटबंदी के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की चीन से भी तेज ग्रोथ ने साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की कोई  सानी नहीं है। नोबल विजेता अमर्त्य सेन समेत पूरी दुनिया के अर्थशास्त्री गला फाड-फाड कर कह रहे थे कि प्रधानमंत्री के इस कदम से  भारतीय अर्थव्यवस्था में जबरदस्त शिथिलता आएगी। मगर मंगलवार को केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी आंकडों ने आलोचकों को सिर खुजलाने के लिए विवश  कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को एक चुनावी सभा में नामी अर्थशास्त्री  अमर्त्य सेन पर यह कहकर पलटवार किया कि कडी मेहनत हार्वड से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होती है।  अमर्त्य सेन नोटबंदी के सबसे बडे आलोचक रहे हैं। सीएसओ की रिपोर्ट में बताया गया है कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ग्रोथ 7 फीसदी से भी अधिक रही है। हालांकि यह इससे पिछली तिमाही (जुलाई से सितंबर) की 7.4 फीसदी ग्रोथ से कम है मगर चीन की 6.8 फीसदी से ज्यादा है। इसका मतलब है कि नोटबंदी से जीडीपी ग्रोंथ पर कोई ज्यादा प्रतिकूल असर नही पडा है। अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियों और नामी अर्थशास्त्रियों का आकलन था कि नोटबंदी से अक्टूबर-दिसंबर तिमाही की ग्रोथ 5.5 से 6.5 फीसदी ही रह पाएगी। अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  ने पिछले सप्ताह ही कहा था कि भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.6 रहेगी और अगले साल तक कहीं जाकर यह सात फीसदी से आगे निकल पाएगी। सुखद  बात यह है की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में कृषि , खनन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स ने तेज ग्रोथ दर्ज की है। कृषि  सेक्टर में छह फीसदी की वृद्धि हुई है। जुलाई-सितंबर तिमाही में यह 3.3 फीसदी थी। मैन्युफेक्चरिंग में पिछली तिमाही की 7.1 फीसदी ग्रोथ की तुलना में इस तिमाही में 8.3 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई है। खनन में ग्रोथ रेट पिछली तिमाही की माइनस 1.5 से बढकर इस बार यह 7.5 फीसदी हो गई है। नोटबंदी के बावजूद तेज ग्रोथ के कई कारण है। सबसे बडा कारण है कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के दौरान देश  की खपत में कोई   ज्यादा गिरावट नहीं आई। सरकारी खपत बढने से यह संभव हुआ। सितंबर तिमाही की 15 फीसदी खपत की अपेक्षा दिसंबर में यह 17 फीसदी रही है। दूसरा प्रमुख कारण है पूंजी निर्माण (कैपिटल फॉरमेषन)। तीन तिमाही तक लगातार घटने के बाद दिसंबर तिमाही में इसमें आधा फीसदी इजाफा हुआ है। नोटबंदी के बावजूद दिसंबर तिमाही की निजी खपत (प्राइवेट  कंजम्पशन ) में ज्यादा गिरावट नहीं आई है। सितंबर तिमाही में यह 7.6 फीसदी बढी तो दिसंबर तिमाही में  7.2 फीसदी यानी मात्र 0.4 फीसदी कम। इन सब कारणों से यह निष्कर्ष   निकलता है कि मोदी सरकार ने नोटबंदी के दौरान ग्रोथ पर प्रतिकूल असर डालने वाले कारकों का पूरा-पूरा ख्याल रखा। इससे यह भी पता चलता है कि नोटबंदी  का निष्पक्ष आकलन करने की बजाय  अर्थशास्त्री राजनीतिक निष्ठाओं   में बंटे हुए हैं। दक्षिणपंथी नोटबंदी की पैरवी कर रहे हैं तो वामपंथी इसका इसलिए विरोध कर रहे थे क्योंकि यह कदम दक्षिणपंथी सरकार का था। निसंदेह, नोटबंदी दीर्घकालीन में अच्छे परिणाम लाएंगे और अगर अल्पावधि में ग्रोथ बरकरार रहती है, तो प्रधानमंत्री वाकई बधाई के पात्र हैं। बेशक, अंतरराष्ट्रीय  एजेंसीज  और अर्थशास्त्रियों का अभी भी आकलन है कि अगली तिमाही में नोटबंदी का ग्रोथ पर ज्यादा प्रतिकूल असर पडेगा।