नवोदित कमल का खिलना और जीओपी (ग्रांड ओल्ड पार्टी-कांग्रेस) का लगातार पिछडते रहना समकालीन राजनीति के अहम पहलू हैं। इन दोनों की राजनीतिक प्रासंगिकता को नकारा नहीं जा सकता। विधानसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित भाजपा ने जहां मिशन 2019 लांच कर दिया है, कांग्रेस अभी तक 2014 लोकसभा चुनाव की हार से भी उभर नहीं पाई है। आजादी से पहले और बाद देश की सियासत में कांग्रेस की अहम भूमिका रही है मगर इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस सियासत में लगातार पिछडती रही है। और अब हालात यह हो गई है कि ग्रांड ओल्ड पार्टी सिमटते- सिमटते चार राज्यों (पंजाब, हिमाचल प्रदेश , मेघालय और कर्नाटक) और केन्द्र शासित पुडुचेरी तक सीमित होकर रह हई है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में इस साल के विधान सभा चुनाव होने जा रहे हैं। कांग्रेस इन दोनों राज्यों में फिर सत्ता में लौट आएगी, इस पर संदेह है। हिमाचल में 1985 के बाद से अब तक कोई भी पार्टी दोबारा सता में नहीं आ पाई है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या पर उपजी सहानुभूति लहर से मिले प्रचंड जनादेश के बाद से 2014 लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस को अपने बूते स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया है। इसके विपरीत अस्सी के दशक में अस्तित्व में आई भारतीय जनता पार्टी साल-दर-साल आगे बढती गई है। 1984 में भाजपा को मात्र 7.74 फीसदी वोट और दो सीटें मिलीं थी और कांग्रेस को 49.10 फीसदी और 404 सीटें। 2014 आते-आते स्थिति यह हो गई कि जीओपी कांग्रेस 8.1 फीसदी वोट और 44 सीटें में सिमट कर रह गई। इसके विपरीत भाजपा नीत राजग को 38.5 फीसदी वोट से 282 सीटें मिलीं। भाजपा 31 फीसदी मतदाताओं की पसंद रही है। इन आंकडों से स्पष्ट है कांग्रेस का जनाधार टूटा है और उसका मुस्लिम-दलित-कबालियों की पार्टी वाला तिलिस्म बुरी तरह से बिखर चुका है। न तो दलित और कबायली और न ही मुस्लिम अब कांग्रेस के पक्के वोटर हैं। हाल ही सपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इस बात के प्रमाण है। पंजाब को छोडकर, अन्य किसी भी राज्य में इन वर्गों ने पहले की तरह कांग्रेस को वोट नहीं डाले। पंजाब में कांग्रेस को नहीं, शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन के खिलाफ दलितों ने वोट डाले हैं। इन चुनाव ने बसपा दलितों और समाजवादी पार्टी मुसलमानों की पार्टी वाला तिलिस्म भी तोड दिया है। मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्य में भाजपा को कांग्रेस की 28 की तुलना में 23 सीटों मिलना साफ दर्शाता है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता अब पूर्वोतर राज्यों में भी बढती जा रही है। असम भाजपा की झोली में पहले ही आ चुका था। अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस को दल-बदलु ले डूबे और अब पूर्वोतर में अकेला मेघालय कांग्रेस के पास बचा है। यह राज्य भी किसी भी समय कांग्रेस के हाथ से फिसल सकता है। बहरहाल, भाजपा का कांग्रेस मुक्त मिशन रंग लाता नजर आ रहा है। इस साल अगर हिमाचल और कर्नाटक भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया तो जीओपी पंजाब तक सिमट कर रह जाएगी । देश के लिए यह बेहद दुखद स्थिति होगी। कांग्रेस को दक्षिणपंथी भाजपा और वामपंथियों के बीच वाली पार्टी माना जाता है। देश में कट्टरवादी राजनीति को संतुलित करने के लिए कांग्रेस का मजबूत होना जरुरी है। इसके लिए कांग्रेस को अपना चोला बदलना होगा। कांग्रेस को एक परिवार पर आश्रित रहने की बजाए लोकप्रिय वैकल्पिक नेतृत्व तैयार करना होगा।
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