आधार पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था से एक बार फिर असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है। शीर्ष अदालत कह रही है कि आधार कार्ड को स्रकारी योजनाओं और कामों के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। मगर केन्द्र सरकार आधार को अनिवार्य करने पर आमादा है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित होने के लिए आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय का कहना है कि आधार कार्ड नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं का पात्र लोगों को लाभ नहीं दिया जाना उनके प्रति अन्याय है। मगर न्यायालय ने यह भी कहा है कि बैंक खाते खोलने जैसे कार्यों के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता को वह रोक नहीं सकती पर वह सरकार को देश के नागरिकों पर इसे थोपने भी नहीं देगी। न्यायालय ने माना कि इस मामले को सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ को सौंपे जाने की जरुरत है पर फिलहाल यह मुमकिन नहीं है। न्यायालय इस पर बाद में विचार करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को स्मरण कराया है कि आधार को अनिवार्य करके वह देश की शीर्ष अदालत के आदेशों की अवहेलना कर रही है। अब तक तीन बार सुप्रीम कोर्ट व्यवस्था दे चुकी है कि आधार को सरकार योजनाओं के लिए स्वैच्छिक होना चाहिए, अनिवार्य नहीं। अगस्त 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य नहीं होगा। न्यायालय की व्यवस्था के अनुसार सरकार से जुडे कामों और कल्याणकार योजनाओं के लिए आधार कार्ड के अलावा और भी द्स्तावेज दिए जा सकते हैं। मगर अक्टूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध को निरस्त करते हुए मनरेगा, पेंशन स्कीमों, भविष्य निधि , प्रधानमंत्री जन-धन योजना और इस तरह की कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार के स्वैच्छिक प्रयोग की अनुमति दे दी । अब सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था से फिर अगस्त 2015 जैसी स्थिति हो गई है। केन्द्र सरकार ने हालांकि स्पष्ट किया है कि किसी भी पात्र व्यक्ति को आधार कार्ड के बगैर सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं किया जाएगा। तथापि, सवाल यह है कि सरकार आधार कार्ड को अनिवार्य करने पर क्यों अडी हुई है? आधार कार्ड बनाने वाली यूनिक आईडेंटिफिकेशन ऑथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) का गठन संप्रग सरकार ने 2009 में किया था और अब कांग्रेस भी आधार कार्ड की अनिवार्यता पर सवाल उठा रही है। आधार कार्ड की अनिवार्यता के आलोचकों का कहना है कि यूआईडीएआई आधार कार्ड के नाम पर नागरिको की निजता (प्राइवेट लाइफ) में दखल दे रही है। देश के नागरिकों के फिंगरप्रिंट लेने के लिए बाकायदा संसद की अनुमति की जरुरत होती है मगर आधार कार्ड मामले में ऐसा नहीं किया गया। आधार कार्ड के लिए यूआईडीएआई द्वारा एकत्रित की जा रही बायोमैट्रिक जानकारी सिटीजंस की निजता में दखल है या नहीं, यह मामला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ही तय कर सकती है। और ताजा स्थिति में यह तय करना बेहद जरुरी है। बहरहाल, आधार कार्ड का मूल मकसद भारतवासियों को 12 डिजिट का यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर देकर हर नागरिक की पहचान को कानूनी वैधता देना है। मगर आधार कार्ड देश के नागरिक होने का प्रमाण नही है और न ही इससे स्थायी नागरिकता मिल सकती है। इस बात के दृष्टिगत आलोचक कह रहें हैं कि फिर इस कार्ड का क्या फायदा? बहरहाल,आधार दुनिया का विशालताम अनूठा आईडी कार्यक्रम है। 28 फरवरी, 2017 तक इसके तहत 1123 खरब लोग पंजीकृत हो चुके हैं और 18 वर्ष से अधिक आयु वाले 99 फीसदी आबादी को आधार कार्ड दिया जा चुका है। इस स्थिति के दृष्टिगत , इस मामले में अब स्थिति स्पश्ट हो जानी चाहिए।
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