सुप्रीम कोर्ट ने गरीब और कमजोर तबकों के निवेशकों से पैसा लेकर उन्हें “बेसहारा“ करने के दोषी सहारा समूह को फिर तगडा झटका दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने सहारा की पुणे स्थित प्रतिष्ठित एंबी वैली टाउनषिप को निवेशकों के 14,000 करोड रु समय पर जमा नहीं कराने के लिए जब्त कर लिया। एंबी वैली की मौजूदा मार्केट वैल्यू 39,000 करोड रु है। यह टाउनशिप कोर्ट के पास तब तक जब्त रहेगी, जब तक सहारा 14, 000 करोड रु की देनदारी के लिए इतने ही मूल्यों की अचल चल-अचल संपति की सूची अदालत में दाखिल नहीं कर लेता। इसके लिए कोर्ट ने सहारा को दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सहारा को फुटकर पैसे देने की बजाए 14,000 करोड रु एकमुश्त जमा करने होंगे। सहारा अब तक 11,000 करोड रु अदालत में जमा करा चुका है। सहारा को 17,400 करोड रु के मूल धन के अलावा पूरी रकम (25,000 करोड से अधिक) पर 15 फीसदी ब्याज भी चुकाना है। सोमवार को सहारा द्वारा 600 करोड रु जमा कराने पर सहारा प्रमुख सुब्रत राय की पैरोल दो सप्ताह और बढा दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए सहारा को जल्द से जल्द एकमुश्त 14,000 करोड रु जमा कराने होंगे, वरना अदालत उनकी एंबी वैली समेत अन्य चल-अचल संपति को कुर्क कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती की वजह से ही लगभग साढे तीन करोड गरीब और कमजोर तबको की गाढी खून-पसीने की कमाई की अदायगी की जा रही है। सहारा ने निवेशकों के पैसे दबाने में कोई कसर नहीं छोडी थी। कायदे-कानून में व्याप्त खामियों का भरपूर फायदा उठाया गया। पूंजी मार्केट को नियंत्रित करने वाली सेबी तक को धत्ता दिया गया। सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने की भी कोशिश की गई। फर्जी दस्तावेज तैयार कर यह प्रमाणित करने का प्रयास की गया कि निवेशको का सारा पैसा लौटा दिया गया है। मगर देश की शीर्ष कोर्ट और सेबी में यह प्रमाणित नहीं किया जा सका। 14 फरवरी, 2014 को अदालत ने सहारा प्रमुख सुब्रत राय को तिहाड जेल भेज दिया और दो साल तक उन्हें जेल में रहना पडा। मई, 2016 से सुब्रत राय पेरोल पर जेल से बाहर हैं। और अगर 27 फरवरी तक पूरी रकम अदा नहीं की गई, तो सहारा प्रमुख को फिर जेल जाना पड सकता है। सहारा इंडिया रीयल इस्टेट एवं सहारा हाउसिंग ने ओसीएफडी (ऑप्शनल फुली कंनवर्टीबल डेबेंचरस) के मार्फत गरीब और कमजोर तबकों के निवेशकों से 17 ,000 करोड रु से भी अधिक एकत्रित किए हैं। गरीब और कमजोर निवेशकों को पूंजी बाजार की कोई जानकारी नहीं होती है, इसलिए इन निवेशकों से लूट-खसोट करना आसान था। सहारा लिस्टिड कंपनी नहीं थी, इसलिए वह सेबी के दायरे से बाहर थी। तथापि ओसीएफडी पूंजी बाजार के दायरे में था, सेबी ने नवंबर, 2010 में सहारा प्रमुख सुब्रत राय और उनकी दोनों कंपनियों पर पब्लिक से धन जुटाने पर प्रतिबंध लगा दिया और सहारा द्वारा जारी ओसीएफडी को अवैध बताया। अब तक सहारा की दोनों की कंपनियां 17,000 करोड रु से ज्यादा इकठ्ठा कर चुकी थी। जून 2011 मे सेबी ने सहारा को निवेशकों का 17,400 करोड फौरन लुटाने के निर्देश दिए। अक्टूबर, 2011 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सेबी एपलैट प्राधिकरण ने सहारा को निवेशकों के 17,400 करोड़ रु 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने के आदेश दिए। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अगस्त 2012 को अदालत ने सहारा को निवेशकों का 25,000 करोड रु ( ब्याज समेत ) फौरन लुटाने को कहा। तब से मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सहरा फुटकर किश्तों में निवेशकों का पैसा लौटा रहा है। सहारा प्रकरण देश में बेहिसाब पांव पसार रही गैर बैंकिग कंपनियों की लूट-खसोट का आइना है। दो दिन पहले नोएडा में पुलिस ने निवशकों से ऑनलाइन 3700 करोड रु लूटने के मामले का पर्दाफाश हुआ है। इस मामले में प्रशासन और रेगुलेटर्स को काफी पहले से पता था मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई। यही देश का सबसे बडा दुर्भाग्य है।
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