विगत वीरवार को दिल्ली बम ब्लास्ट मामले में अदालत के फैसले से 12 साल बाद पीडित परिवारों के नासूर फिर हरे हो गए। दीपावली से ठीक दो दिन पहले 29 अक्टूबर, 2005 को देश की राजधानी दिल्ली में आतंकियों ने तीन जगह बम फोडे। इन बम विस्फोटों में 67 लोग मारे गए और 210 जख्मी हो गए थे। दुनिया में किसी भी मुल्क का कानून 67 निर्दोष लोगों की हत्या करने वालों को मौत की ही सजा देगा। मगर अदालती फैसले साक्ष्यों और सबूतों पर दिए जाते हैं और उन्हें जुटाने की जिम्म्मेदारी अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूषन एजेंसी) पर होती है। देश का अभियोजन पक्ष इतना कमजोर है कि हमेशा की तरह इस बार आतंकियों के खिलाफ भी अदालत में ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए। ठोस सबूतों और पुख्ता साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने आरोपी तारिक अहमद डार को 10 साल की सजा सुनाई और दो अन्य आरोपियों को साफ बरी कर दिया। बम विस्फोटों के प्रमुख आरोपी डार को 10 साल की सजा निर्दोष लोगों की हत्या करने के लिए नहीं मिली है, अलबत्ता गैर-कानूनी गतिविधियों में संलिप्त होने के लिए सुनाई गई है। बाकी दो आरोपियों को अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। यानी तीनो आरोपियों को अदालत ने बम फोड़ने और निर्दोषों की हत्या से साफ बरी करा दिया है।.12 साल से जेल में बंद डार भी बरी हो जाएगा, क्योंकि अदालत ने उसे 10 साल की सजा सुनाई है। तीनों आरोपी कश्मीर घाटी से हैं, इस स्थिति के दृष्टिगत हिंसा और अलगाववाद में जल रही घाटी में आतंक फैलाने वालों को और ज्यादा शह मिल सकती है। कानून अगर निर्दोष लोगों के हत्यारों को भी सजा नहीं दे पाए, तो पीडितों के साथ-साथ जनमानस का निराश होना स्वभाविक है। इस तरह की व्यवस्था से सिर्फ अपराध ही बढ़ेगा । 12 साल से पीडित परिवार यह उम्मीद लगाए हुए थे कि 67 लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार आतंकियों को मौत की सजा मिलेगी। आरोपियों का साफ बरी हो जाना पीडित परिवारों के जख्मों पर नमक छिडकना जैसा है। और आरोपियों का हंसते हुए अदालत से बाहर निकलना पीडितों को और ज्यादा आहत कर रहा है। दिल्ली बम ब्लास्ट में पुलिस की खासी किरकिरी हुई है। सबूतों और साक्ष्यों के अभाव में अदालत द्वारा दो आरोपियों को पूरी तरह से बरी किए जाने से पुलिस की जांच पर ही संदेह होने लगता है। आतंकियों के खिलाफ इतना कमजोर अभियोजन पक्ष संभवतय आज तक सामने नही आया। अदालत ने अपनी 147 पृष्ठीय फैसले में अभियोजन पक्ष की खामियों और पुलिस की लचर जांच पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि जांच से लगता नहीं है कि पुलिस वास्तव मे गंभीर थी। 365 साक्ष्यों के बावजूद आरोपी साफ बच निकलें, इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि दिल्ली पुलिस ने मामले पर खासी लीपा-पोती की है। अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उन लोगों को पकडा है, जो बम विस्फोट में संलिप्त ही नहीं थे। मामले में एक आरोपी श्रीनगर निवासी मोहम्मद रफीक शाह ने रिहाई के बाद एक चैनल्स से बातचीत मे कहा भी है कि उन्हें अपनी बेगुनाही को लेकर अदालत पर पूरा भरोसा था। शाह श्रीनगर यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्ट्डीज में स्नाकोतर की पढाई कर रहे थे, जब उन्हें दिल्ली बम विस्फोटके आरोप में गिरफ्तार किया गया। दिल्ली में बम विस्फोट के समय शाह श्रीनगर यूनिवर्सिटी में थे और पुलिस को इस बात के सबूत भी दिए गए। मगर वह नहीं मानी और शाह को गिरफतार कर जेल में ठूंस दिया गया। उन्होंने जेल में रहकर पढाई की। शाह की तरह कश्मीर के कई युवक दिल्ली की तिहाड जेल में बंद हैं। पुलिस की इस तरह की बर्बरता के कारण ही कश्मीर सुलग रहा है। एक तरफ आतंक के पीडित हैं, जिन्हें न्याय चाहिए और दूसरी तरफ ऐसे युवक हैं, जो पुलिस की कमजोर कार्यशैली से पीडित हैं। इस तरह की व्यवस्था से जनमानस का पुलिस और अभियोजन पर बचा-खुचा भरोसा भी जाता रहेगा।
सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
Delhi Bomb Blast : Judgement Sprinkles Salt On Victims' Wounds
Posted on 8:57 pm by mnfaindia.blogspot.com/






