एयरसेल-मेक्सिस डील मामले में पूर्व केन्द्रीय संचार मंत्री दयानिधि मारन को अदालत द्धारा भ्रष्ट्राचर के आरोपों से बरी किए जाने से सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को जबरदस्त झटका लगा है। 743 करोड के इस घोटाले में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के सबूतों से अदालत संतुष्ट नहीं थी। अदालत ने प्रर्याप्त सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। देश की शीर्ष जांच एजेंसियां भी अगर आरोपियों के खिलाफ प्रर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाए, तो निचले स्तर से क्या उम्मीद की जा सकती है? दयानिधि मारन न केवल रसूकदार सियासी परिवार से हैं, अलबत्ता साधन सपन्न भी है। मारन तमिल नाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एवं द्रमुक नेता करुणानिधि के पौत्र हैं। उनके पिता मुरासोली मारन भी द्रमुक के कददावर नेता थे। दयानिधि मारन के साथ, उनके भाई कलानिधि मारन और अन्य आरोपियों को भी बरी कर दिया है। कलानिधि मारन दक्षिण भारत के टीवी चैनल “सन“ के मालिक है। दयानिधि मारन पर 2006 में 743 करोड रु के एयरसेल-मेक्सिस डील में कथित घूस लेने और मनीलांड्रिंग के आरोप थे। इसके अलावा मारन पर अपने भाई सन टीवी को बीएसएनएल के 343 अवैध कनेक्शन देने के भी आरोप थे। 2जी स्पेक्ट्रम में करुणानिधि की बेटी सांसद कनिमोझी और पूर्व संचार ए राजा को भी जेल हो चुकी है। दोनों पर अभी भी मुकदमा चल रहा है। इस मामले में राजा को 15 महीने जेल में रहना पडा था। मारन बंधुओं के बरी होने से सीबीआई की जांच पडताल पर फिर सवालिया निषान लग गया है। भारत में प्रोसिक्यूशन मशीनरी इस कद्र निकम्मी, पक्षपाती और भ्रष्ट हैं कि अक्सर रसूकदार लोग सबूतों के अभाव में अदालत से छूट जाते हैं। 2जी स्कैम में सीबीआई के पूर्व निदेशक रणजीत सिंहा की भूमिका भी संदिग्ध रही है। उन पर आरोप हैं कि सीबीआई निदेशक रहते हुए भी वे 2जी स्कैम के आरोपियों से अपने आवास पर मुलाकात करते थे। पुलिस को उनके सरकारी आवास पर सुरक्षा कर्मियों की डायरी से 2जी स्कैम से जुडे लोगों की आवाजाही के सबूत मिले थे। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया सीबीआई को इस मामले में अपने ही पूर्व बॉस की जांच के आदेश दिए हैं। इस प्रकरण से देश की प्रॉसिक्युशन एजेंसिंयों की कार्यशैली का पता चलता है। सीबीआई अदालत द्धारा दयानिधि मारन और अन्य आरोपियों को बरी किए जाने से अब इस बात की भी संभावना है कि कनिमोझी और ए राजा भी बरी हो जाएंगे। न्यायपालिका सबूतों पर अपने फैसले सुनाती है और सबूत एकत्र करना प्रोसिक्यूशन एजेसियों का काम है। देश में प्रोसिक्यूशन एजेसियों में न केवल भ्रष्टाचार व्याप्त है, अलबत्ता वे सरकार के इशारे पर अथवा राजनीतिक चश्मे से जांच करती हैं। मारन ही नहीं, पिछले साल अक्टूबर में सीबीआई कोर्ट द्वारा कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को 40 करोड के घूसकांड मे क्लीन चिट दी गई थी। येदियुरप्पा अब भाजपा के कर्नाटक प्रदेशाध्यक्ष हैं। इस मामले में भी प्रासिक्यूशन येदियुरप्पा के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाया। सबूतों के अभाव में सियासी नेताओं के अदालत से बाइज्जत बरी होने के और भी कई मामले है। इशरत जहां फर्जी मुठभेड मामले में सीबीआई भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को कलीन चिट दे चुकी है। अमित शाह तब गुजरात के गृहमंत्री थे। महाराष्ट्र की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री पंकज मुंडे को दिसंबर 2016 में एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने “चिक्की“ मामले में क्लीन चिट दी गई। पंकज मुंडे पर स्कूली बच्चों के वर्दी के 203 करोड घोटाले में अनियमितताएं बरतने के आरोप थे। यह बात जगजाहिर है कि सरकार के अधीन काम कर रहा एसीबी अपने ही मंत्री के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने की हिमाकत नहीं कर सकता । देश मे प्रासिक्यूशन की यही त्रासदी है। एक तो “कंगाली, उस पर आटा गीला“। करप्शन में गले तक आकंठ पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। और जब तक प्रासिक्यूश न पर्याप्त एवं ठोस सबूत जुटाने के प्रति समर्पित नहीं हो जाता, रसूकदार आरोपी इसी तरह अदालत से बरी होते रहेंगे।
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