शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

No End To The Dirty Spell of Intolerance

छात्र नीति में दक्षिणपंथी और वामपंथी संगठनों के बीच वैचारिक मतभेद समझ में आते हैं मगर इसमें हिंसा और असहिष्णुता  का घालमेल बेहद खतरनाक है। छात्र देश  का भविष्य  होते हैं और अगर वे अध्ययन  काल से ही हिंसा और असहिष्णुता  सेे ग्रस्त हो जाए , तो देश  का संकटग्रस्त हो जाना  निश्चित है ।  दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में बुधवार को छात्रों के दो गुटों के बीच  हुई हिंसक झडप देश  में बढती असहिष्णुता को  दर्शाती  है। बुधवार को  जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के दो छात्रों को रामजस कॉलेज में होने वाले सेमिनार में आमंत्रित किया गया था। दोनों छात्र वामपंथी छात्र संगठन आइसा से सम्बद्ध है। इन दोनो छात्रों को बुलाए जाने से क्षुब्ध भगवा पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (एवीबीपी)  ने हंगामा खडा कर दिया। जिस जगह सेमिनार हो रहा था, उस पर  बाहर से ताला जड दिया गया और आमंत्रितों पर पत्थर फेंके गए।  एवीबीपी से सम्बद्ध छात्रों को   इस बात का गुस्सा था कि सेमिनार में जेएनयू के उन छात्रों को आमंत्रित किया गया था,  जिनपर पिछले साल  “देशद्रोह“ के आरोप लगे थे और इस पर उन्हें जेल में भी जाना पडा था। एवीबीपी छात्रों के गुस्से के  मद्देनजर   कॉलेज प्रबंध ने जेएनयू के छात्रों को भेजा निमंत्रण वापस ले लिया। इससे भडके आइसा से सम्बद्ध छात्रों और कुछ  शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन  निकाला और इस दौरान प्रतिद्धंद्धी गुटों में दो बार हिसंक झडप हो गई। इन झडपों में पुलिसकर्मियों और पत्रकारों समेत कई लोग घायल हो गए। पुलिस ने एवीबीपी  प्रदर्शनकारियों  को समझाने की कोशिश  भी की कि आइसा  के पास प्रदर्शन  के लिए परमिशन है, इसलिए उन्हें हट जाना चाहिए। इस पर एवीबीपी प्रदर्शनकारियों   की पुलिस से ही तनातनी हो गई। इस प्रकरण को लेकर वामपंथी छात्र संगठनों का आरोप है कि  पुलिस एवीबीपी की मदद कर रही थी। दिल्ली पुलिस पर अक्सर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।  इससे खफा माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने रामजस कॉलेज प्रकरण को “स्टेट मशीनरी प्रायोजित  असहिष्णुता  करार दिया है। सेमिनार में किसे  बुलाना है और किसे नहीं, यह फैसला आयोजकों का होता है। इसमें छात्र संगठनों को ऐतराज नहीं होना चाहिए। मगर एवीबीपी यह बात मानने को तैयार नहीं है।  दिल्ली में वामपंथी और अखिल भारतीय परिषद के अपने-अपने किले हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी पर बीच-बीच में कांग्रेस से सम्बद्ध एनएसयूआई ( नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया) को छोडकर बराबर अखिल भारतीय विधार्थी परिषद का कब्जा रहा है और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपा के कई शीर्ष  इसी यूनिवर्सिटी के प्रॉक्डट हैं। पिछले साल अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली मे “आप“ की उपस्थित दर्ज  करवाने की कोशिश  की थी  मगर उन्हें भी मुह की खानी पडी। दूसरी ओर, जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी पर एक-आध बार को छोडकर हमेशा  वामपंथी दलों से सम्बद्ध छात्रों का दबदबा रहा है और सीता राम येचुरी समेत कई ख्यातिप्राप्त  शिक्षाविद, नौकरशाह जेनयू के छात्र रहे हैं। न तो आज तक वाममंथी छात्र संगठन दिल्ली यूनिवर्सिटी पर अपना परचम लहरा पाएं हैं और न ही एबीवीपी जेएनयू में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाई है। निष्कर्ष  यह है कि जेएनयू वाम विचारधारा की नर्सरी है, तो दिल्ली यूनिवर्सिटी में दक्षिणपंथी एवं वामपंथी विरोधी विचारधारा का बोलबाला है। यही झगडे की असली वजह है। जेएनयू में दक्षिणपंथियों की उपस्थित वाम छात्र संगठनों को फूटी आंख नही सुहाती और  एवीबीपी दिल्ली यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा की काट की हर संभव कोशिश  करती रहती है। यही मानसिकता छात्रों के बीच बढ्ते तनाव की असली वजह है। पिछले साल जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार और पांच अन्य छात्रों पर देशद्रोह का मामला दर्ज करवाने में दक्षिणपंथी छात्रों का हाथ रहा है। बहरहाल, यूनिवर्सिटी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विचारों की आजादी  और सहिष्णुता  का स्तंभ होती है। और  शिक्षा के मंदिर में हर आस्था को आने की छूट होती है। दुखद बात यह है कि भाजपा और उससे सम्बद्ध संगठन इससे सहमत होते नही लगते हैं।