गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

आम आदमी को निराषा

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बुधवार को ब्याज को सस्ता न करके आम आदमी को निराश  किया है। नोटबंदी के बाद मंदी से पीडित अर्थव्यवस्था को उभारने के लिए मांग को लिफ्ट करना अपरिहार्य है और इसके लिए कर्ज को सस्ता करने की दरकार थी। ताजा मौद्रिक नीति की घोषणा से पहले इंटरनेशनल  एजेंसियों के सर्वेक्षणों में अधिकांश  अर्थशास्त्री  ब्याज  दरों  में 0.25 फीसदी  कटौती की उम्मीद कर रहे थे। ब्याज दरों में  0.25 फीसदी की कटौती से देश  में कर्ज  छह साल के न्यूनतम स्तर पर आ जाता और बाजार में अतिरिक्त नगदी आने से मांग उठती।  अभी बेंचमार्क रेपो रेट 6.25 फीसदी है और आरबीआई ने दूसरी बार ब्याज दरों को यथावत रखा है। आरबीआई का अपना आकलन है कि चालू वित्तीय साल मे ग्रॉसं वैल्यू एडेड ग्रोथ (जीएवी) 7.1 फीसदी से घटकर 6.9 फीसदी ही रहेगी और यह और नीचे भी गिर सकती है। इसके बावजूद आरबीआई को उम्मीद है कि अगले वित्तीय साल (2017-18) के दौरान  ग्रॉसं वैल्यू एडेड ग्रोथ में तेजी आएगी और जीएवी ग्रोथ 7.4 फीसदी के करीब रहेगी। ब्याज को यथावत रखने के लिए आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने  तीन कारण गिनाए हैं। पहला अहम कारण यह कि अंतरराष्ट्रीय  स्तर में भारी अनिशिचितता  व्याप्त है और तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल हो रही है। कमोडिटी के घटते-बढते दाम से मुद्रा-स्फीति का सही-सही आकलन नहीं किया जा सकता। पटेल ने तीसरा कारण यह गिनाया कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था और महंगाई पर सम्रग प्रभाव अभी देखा जाना बाकी है। इस पर आरबीआई पैनी नजर रख रही है। आरबीआई की मौद्रिक नीति राजनीतिक  चश्मे  से तय नहीं की जाती। मोदी सरकार ने ब्याज दरें तय करने के लिए छह सदस्यीय समिति बना रखी है। समिति ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों को यथावत रखने का फैसला लिया। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री द्वारा सस्ते कर्ज की वकालत के बावजूद भी कर्ज  सस्ता नहीं किया जना आरबीआई की स्वायतता  दर्शाता  है हालांकि वित्त मंत्री ने बजटीय घाटे को तय सीमा में रखकर सस्ते कर्ज का मार्ग प्रशस्त किया है। आरबीआई इस सच्चाई से भी बखूबी परिचित है कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। नोटबंदी के कारण एक झटके में मोदी सरकार ने 87 फीसदी नगदी को सोख लिया और नकदी पर निर्भर अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। नतीजतन, चालू साल का ग्रोथ रेट 7.9 से गिरकर 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है। यह बहुत बडी गिरावट है और इसे रोकने के लिए अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढाने की जरुरत है। आरबीआई, लगता है अंतरराष्ट्रीय  घटनाओं से कुछ ज्यादा ही चिंतित है। निसंदेह, तेल की कीमते लगातार बढने से भारत में मुद्रा-स्फीति में अप्रत्याशित उछाल आ सकता है, मगर सरकार तेल की घरेलू कीमतों को नियंत्रित रख सकती है। तेल की कीमतें जब लगातार गिर रहीं थीं, सरकार ने फ्यूल पर कई बार एक्साइज डयूटी बढाकर जमकर कमाई की। तब यह कहा गया था कि अगर तेल कीमतें बढती हैं, तो सरकार एक्साइज डयूटी को कम करके मुद्रा स्फीति का आयात नहीं होने देगी। सरकार के पास अभी यह विकल्प है। आरबीआई माने या न माने मगर बाजार में, खासकर ग्रमीण क्षेत्रों में नगदी का अभी संकट बना हुआ है। रेपो रेट में मात्र 0.25 फीसदी कटौती से ही बाजार में बीस हजार करोड की अतिरिक्त नगदी आ जाती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खुद इस बात की वकालत की थी कि ब्याज में 0.25 फीसदी कटौती से अर्थव्यवस्था को पर्याप्त नगदी मिल सकती है । बहरहाल, ब्याज दरें यथावत रखकर  आरबीआई ने मौद्रिक नीति में बदलाव के संकेत दिए हैं। अभी तक आरबीआई उदार  ब्याज दरों वाली (इंटरेस्ट इजिंग साइकल) नीति अपनाता रहा है मगर आगे से आरबीआई तट्स्थ नीति पर जोर देगा। इसका मतलब है कि आरबीआई  अर्थव्यवस्था  की दशा   और दिशा   देखकर मौद्रिक नीति तय करेगा। इस बार भी यही किया गया है।