समकालीन सियासी नेता अभद्र और अमर्यादित छींटाकशी को विरोधियों पर आक्रमण करने का अचूक अस्त्र मानते हैं, भले ही इससे पद अथवा संस्था की गरिमा को गहरी चोट पहुंचे। एलडर हाउस राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन को लेकर प्रधानमंत्री की टिप्पणी से कांग्रेस आग-बबूला है। बुधवार को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के जवाब में प्रधानमंत्री ने मनमोहन सिंह पर जब “बाथरुम में रेनकोट में नहाने की कला में माहिर है“ तंज कसा, सदन में खासा हंगामा बरपा। हालात इस कद्र बिगड गए कि सभापति को उठकर जाना पडा। वीरवार को भी कांग्रेस ने सदन के भीतर और बाहर खूब हंगामा किया। सबसे दुखद स्थिति सभापति उप-राष्ट्रपति हमीद अंसारी पर पक्ष और विपक्ष द्धारा पक्षपात के आरोप लगाने से पैदा हुई। सत्ता पक्ष का आरोप था कि उनके (हमीद अंसारी) रहते सदन का माहौल नकारात्मक बना हुआ है। यह बेहद गंभीर आरोप है और इससे उप राष्ट्रपति (राज्यसभा सभापति) का आहत होना स्वभाविक है। विपक्ष ने भी उन पर पक्षपात का आरोप लगाया। सभापति पर पक्ष और विपक्ष के इन आरोपों से एलडर हाउस की गरिमा कम हुई है। राज्यसभा ही नहीं नेताओं के अभद्र और अप्रिय बयानों से प्रधानमंत्री और अन्य शीर्ष पदों की गरिमा को भी चोट पहुंची है और इससे लोकतंत्र ही कमजोर हो रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों अथवा नरेन्द्र मोदी, वह किसी पार्टी विशेष का नहीं, पूरे देश का होता है । भारत में प्रधानमंत्री पूरे बहुमत से जनता द्धारा चुना जाता है और उनका अपमान पूरे देश का अपमान है। डाक्टर मनमोहन सिंह बेहद शालीन, भद्र और प्रबुद्ध सियासी नेता हैं। बतौर प्रधानमंत्री उनकी कार्यशैली में न तो किसी तरह की उग्रता थी और न ही कोई अहं। उन्होंने कभी भी पद की गरिमा और स्थापित मर्यादाओं की सीमा नहीं लांघी। इसीलिए कांग्रेस उनको लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनषील है। मगर सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने डाक्टर मनमोहन सिंह पर ऐसी कौनसी अभद्र टिप्पणी कर दी जो कांग्रेस को बुरी तरह से चुभ गई। “बाथरुम में रेनकोट की कला“ को किसी भी तरह से अभद्र शब्दावली नहीं माना जा सकता। दरअसल, इसमें छिपे तंज ने कांग्रेस को कहीं ज्यादा आहत किया है। काग्रेस को संप्रग सरकार के समय में हुए घोटालों का दंश आज भी सता रहा है। लोकतंत्र में अपने विरोधियों पर शालीनता से आक्रमण करने की छूट होती है। राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेता प्रधानमंत्री मोदी पर कई बार अभद्र टिप्णियां कर चुके हैं। राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर “खुन की दलाली“ जैसे संगीन आरोप लगा चुके हैं। देश का बच्चा-बच्चा यह बात कहेगा कि प्रधानमंत्री के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। टवीटर पर राहुल की इस शब्दावली की लोगों ने कडी भर्त्सना की थी और “राहुल ग्रो अप“ का सुझाव दिया था। तथापि प्रधानमंत्री और कुछ शीर्ष नेताओं को छोडकर भाजपाई बदजुबानी और असहिष्णुता के लिए जाने जाते हैं। इसी कारण भाजपाइयों के बयान से विपक्ष जरुरत से ज्यादा जल-भुन जाता है। चुनाव के समय तो भाजपाइयों की जुबानी और ज्यादा फिसल जाती है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश के बिजनौर की चुनाव रैली में फिर राहुल गांधी पर तंज कसते हुए कहा, “कांग्रेस के एक नेता (राहुल गांधी की ओर इशारा) की बचकानी हरकतों को लेकर गूगल पर इतने चुटकलें हैं कि शायद ही किसी अन्य सियासी नेता पर इतने चुटकलें होंगे़। वे ऐसी हरकतें करते हैं कि कांग्रेस नेता भी उनसे दस फीट की दूरी पर रहना पसंद करते हैं“। कांग्रेस इस बयान पर भी भडक सकती है मगर इस तरह की तंज भरी शब्दावली अभद्र और मर्यादाहीन नहीं कही जा सकती। बहरहाल, लोकतंत्र मूल्यों एवं स्वस्थ परंपराओं के निर्वहन से फलता-फूलता है। स्वस्थ मूल्यों, मर्यादाओं और परंपराओं की सीमाओ को स्पष्टतय परिभाषित नहीं किया जा सकता। सियासी पार्टियों और राजनेताओं को स्वंय इन मर्यादाओ और परंपराओं की सीमाओं को तय और परिस्थापित करना होगा।
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