भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेषन- इसरो) ने एक साथ 104 सैटेलाइटस का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण (लांच) कर नया इतिहास रचा है। बुधवार को इसरो ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से एक साथ 104 सैटेलाइटस लांच करके नया विश्व रिकार्ड भी बनाया है। 18 मिनट के अंतराल में सभी 104 सैटेलाइटस को प्रक्षेपित कर लिया ग्या। अब तक एक साथ 37 सैटेलाइटस छोडने का रिकार्ड रुस के नाम था। रुस ने 2014 में यह कीर्तिमान स्थापित किया था। इससे पहले इसरो ने 2016 में एक साथ अंतरिक्ष में 20 सैटेलाइटस भेजे थे। इन 104 सैटलाइटस में केवल 3 भारत के हैं । बाकी 101 अमेरिका, स्विटजरलैंड इसराइल, नीदरलैंड और कजाख्स्तान के हैं। 96 सैटेलाइट्स अकेले अमेरिका के हैं। बाकी देशों की एक-एक। भारत के तीन सैटेलाइटस में एक का वजन 760 किलोग्राम और अन्य दो का 19-19 किलोग्राम था। भारतीय मिशन के पास अपने तीन सैटेलाइटस के अलावा 600 किलोग्राम और क्षमता थी। इसीलिए, इसरो ने अन्य देशों के सैटेलाइटस भेजने का निर्णय लिया। इससे भारत को लगभग 100 करोड रु की आय हुई है। इस तरह मिशन का आधा खर्चा विदेशी सैटेलाइटस को भेजने से पूरा हो गया है। अंतरिक्ष स्पेस मिशन ऐसा क्षेत्र है, जिसमें भारत विकसित देशों से भी आगे है और अमरिका भी उसका लोहा मानता है। बुधवार को अमेरिका और इसराइल के सैटेलाइटस भेजकर इसरो ने न केवल रिकॉर्ड बनाया, अलबत्ता सैटेलाइटस प्रक्षपेण बाजार में अपना सिक्का भी जमाया है। अब तक भारत अंतरिक्ष में 29 देशों के 79 सैटेलाइटस प्रपेक्षित कर चुका है। इसमें गूगल और एयरबेस जैसी विशाल कंपनियो के सैटेलाइट भी शामिल है। इससे पता चलता है कि पूरी दुनिया सैटेलाइट प्रक्षपेण में भारत पर कितना भरोसा करती है। सैटेलाइट प्रक्षेपण में कम लागत की वजह से भारत इस क्षेत्र में बडा प्लेयर बनकर उभरा है। अमेरिका की तुलना में भारत से सैटेलाइटस भेजने का खर्च 60 फीसदी तक कम है। भारत मात्र एक-तिहाई खर्च पर किसी भी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम है। इसलिए, सैटेलाइट प्रक्षेपण के लिए भारत पहली पसंद है। भारत में लेबर सस्ती है, इसलिए लागत भी कम है। तथापि अंतरराष्ट्रीय सैटेलाइट प्रक्षेपण बाजार में छोटे उपग्रहो का बहुत कम हिस्सा है। भारत को अगर इस बाजार से कमाई करनी है तो उसे बडे सैटेलाइटस को प्रक्षेपित करने की क्षमता बढानी होगी। इस मामले में चीन हमसे कहीं आगे है। भारत के पास इस समय केवल 5 सैटेलाइटस लांच करने की क्षमता है। चीन के पास 20 मिशन लांच करने की क्षमता है। भारत की तुलना में चीन अंतरिक्ष अभियान पर 250 फीसदी ज्यादा खर्च कर रहा है। बहरहाल, सीमित बजट और क्षमता के बावजूद भारत और चीन में कडा मुकाबला है और भारत छोटे उपग्रह लांच करने में चीन से आगे है। साधनों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1981 में भारतीय अंतरिक्ष साइंस संस्था को अपनी छठी सैटेलाइट एपल को पैलोड तक बैलगाडी मे ले जाना पडा था। इससे पहले कम लागत में मंगल ग्रह पर “मंगलयान“ की सफल कामयाबी पर भी भारतीय वैज्ञानिक नासा में अपना लोहा मनवा चुके हैं। मंगलयान पर भारत ने मात्र 450 करोड रु खर्च किए थे जबकि अमेरिका के मैवन पर ही इससे दस गुना ज्यादा खर्च हुआ था। सबसे बडी उपलब्धि यह है कि मंगलयान एक ही प्रयास में मंगल पर सफलतापूर्वक पहुंच गया था। अमेरिका की नासा भी यह कीर्तिमान स्थापित नहीं कर पाया है। मंगल के बाद अब इसरो सूरज, षुक्र और जुपिटर पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करने की तैयारी में है। इसरो मंगल और चंद्रमा (मून) पर फिर से उपग्रह भेज रहा है। एक साथ 104 सैटेलाइटस सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करने के लिए देशवासियों को भारतीय वैज्ञानिकों की इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर गर्व है और उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हैं।
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