शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

Just Six Days Jail for 59 Killing Like Sprinkling Salt On Wounds

भारतीय इतिहास के सबसे भीशणतम उपहार सिनेमा अग्निकांड के मामले में 20 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला पीडित परिवारों के घावों पर नमक छिडकने जैसा है। दिल्ली के मशहूर ग्रीन पार्क स्थित अंसल बंधुओं के उपहार सिनेमा के बाहर बार्डर फिल्म का आधा जला हुआ पोस्टर, मृतकों के जूते-चप्पल और बैग आज भी इस हादसे के गवाह हैं। 1997 में जब यह हादसा हुआ, तब उपहार सिनेमा में “बार्डर“ फिल्म दिखाई जा रही थी। सुप्रीम  कोर्ट ने 59 लोगों की मौत के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार अंसल बंधुओं को एक-एक साल की सजा सुनाई है। यानी हर मौत के लिए सिर्फ छह दिन की सजा। छोटे भाई गोपाल अंसल चार महीने की सजा पहले ही काट चुके हैं, इसलिए अब उन्हें आठ माह ही जेल में रहना पडेगा। 77 वर्षीय  सुशील  अंसल की वृद्धावस्था का ख्याल करते हुए उन्हें कोई सजा नही दी गई है। वे पहले ही एक साल की सजा काट चुके हैं, इसलिए इसे ध्यान में रखा गया है। करीब 20 साल पहले 13 जून, 1997 को राजधानी दिल्ली के नामी ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में भीषण आग लगने से 59 लोग मारे गए थे और भगदड में 103 घायल हो गए थे। उपहार सिनेमा  अग्निकांड में न्यायपालिका की अलग-अलग फैसले आए हैं। अदालत ने उपहार अग्निकांड के मृतकों के परिजनों को लगभग 40 करोड रु का मुआवजा दिया था। भारत में सिविल मुआवजे के इतिहास में अदालत के इस फैसले को मीलपत्थर माना गया है। निचली अदालत ने अंसल बंधुओं को दो-दो साल की सजा सुनाई  थी। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा को घटाकर एक साल कर दिया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए सजा को आगे बढाने की बजाय अंसल बंधुओं पर 30-30 करोड रु का जुर्माना लगाया। उपहार सिनेमा अग्निकांड को लेकर सीबीआई, लॉ कमीशन, नरेश  कुमार कमेटी, दिल्ली अग्निशमन विभाग और डिप्टी कमिशनर आँफ पुलिस (डीसीपी) की अलग-अलग रिपोर्टस का निकर्ष   था कि उपहार सिमेमाघर में सुरक्षा को लेकर भारी चूक हुई थी। हादसे के समय सिनेमा घर में एमरजेंसी, फुट और एक्जिट  लाइटस तक नहीं थी जबकि नियमानुसार ऐसा करना अनिवार्य  था। पब्लिक एनाउंसमेंट सिस्टम तक नही था, इस कारण आग लगने के बारे सिनेमा देख रहे लोगों को सूचित तक नहीं किया जा सका।  उपहार सिनेमाघर प्रबंधन  द्धारा  अवैध एक्सटेंशन किए जाने और अतिरिक्त सीटें लगाए जाने से बाहर जाने के मुक्त रास्ते तक बंद हो चुके थे। हद इस बात की थी कि बाहर जाने के बचे दोनों रास्तों पर भी  ताले जडे हुए थे। सिनेमाघर का जो स्पेस खुला रखा जाना था, वहां दुकानें खोल रखीं थी। डीवीए ट्रांसफोर्म को अवैध रुप से लगाया गया था और सुरक्षा के कोई उपाय नहीं थे। इन सब कारणों से ही सिनेमाघर में 59 लोगों को घुट-घुट कर मरना पडा और इसके लिए सिनेमा मालिक अंसल बंधु जिम्मेदार थे। देश  में कायदे-कानून का सरेआम उल्लघंन करना और इन्हें तोडना-मरोडना रसूखदारों के  बाएं  हाथ का खेल है। उपहार सिनेमा अग्निकांड मामले की सुनवाई के दौरान अदालत से दस्तावेज तक गायब कर दिए गए। 2003 में इस मामले के सरकारी वकील ने अदालत को बताया था कि चार्जशीट के साथ दायर महत्वपूर्ण दस्तावेज  अदालत के रिकार्ड से गायब हैं और कुछ दस्तावेंजों से छेडखानी करके उन्हें बेकार कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सोशल मीडिया में भी तीखी प्रतिकियाएं आई हैं। इस बात में दो राय नहीं है कि न्यायपालिका में अभी भी आम आदमी को नैसर्गिक न्याय मिलना आसान नहीं है। साक्ष्यों और  प्रॉसिक्यूशन  पर निर्भर भारतीय न्यायिक व्यवस्था न केवल समय खपाऊ और महंगी है, अलबत्ता साधन संपन्न तबकों के पक्ष में है। साक्ष्यों को बरगलाना अथवा खरीद कर अपने पक्ष में कर लेना और  दुर्बल प्रॉसिक्यूशन आधारित   न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। इस व्यवस्था में आम आदमी के लिए बहुत कम स्पेस है।