मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

Rise Of Sasikala: Democracy Given A Severe Blow

ऐसा केवल भारत में ही हो सकता है और दक्षिण भारत के राज्य तमिल नाडु में तो सौ फीसदी हो सकता है। कभी चुनाव नहीं लडा, न कभी पंचायत या पार्षद  बनी और न ही कभी एमएलए अथवा एमपी। फिर भी शशिकला कला ( पूरा नाम विवेकानंदन किश्नावेनी  शशिकला) सीधे तमिल नाडु की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने जा रही है। रविवार को  एआईएडिएमके के विधायकों ने  शशिकला को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना।  तीन बार के “स्टैंड बाई“ मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम ने खुद उनका नाम प्रस्तावित किया। पूर्व  मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके लीडर जयललिता की सबसे विश्वास  पात्र  शशिकला को “चिनम्मा“ के नाम से जाना जाता है। “चिनम्या“ का अभिप्राय  होता है“ छोटी बहन“ और इसलिए पार्टी के विधायकों ने  शशिकला को अम्मा (जयललिता) की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी चुना है। विधायकों पर शशिकला की जबरदस्त पकड रही है क्योंकि टिकट बांटने में उनका बहुत बडा हाथ था। इसीलिए, अम्मा के निधन के तुरंत बाद से शशिकला को जयललिता का उत्तराधिकारी बनाने के लिए जमीन तैयार की जाने लग पडी थी। और इसमें शशिकला के पति एम नटराजन की बहुत बडी भूमिका है। नटराजन को तमिल नाडु का चाणक्य माना जाता है। नटराजन एआईएडीएमक केे तब प्रचार सचिव थे, जब एमजी रामचद्रन (एमजीआर) राज्य के मुख्यमंत्री थे। एमजीआर को जयललिता का मेंटर माना जाता है। नटराजन ने ही अपनी पत्नी शशिकला  की जयललिता से मुलाकात करवाई थी और पत्नी को जयललिता का करीबी बनाना उनकी “चाणक्य“ नीति का हिस्सा था। एमजीआर के निधन के बाद जब जयललिता पार्टी में जगह बनाने के लिए जूझ रही थी, उस समय नटराजन ने उनकी काफी मदद की थी। यह बात दीगर है कि बाद में जयललिता और नटराजन के रिश्तों  में दरार आ गई थी। जयललिता के निधन के बाद से पार्टी में एक तरह का खालीपन आ गया था। पार्टी को अम्मा जैसे चमत्कारी शख्सियत की जरुरत थे। पनीरसेल्वम इस फ्रेम में फिट नहीं हो रहे थे। पनीरसेल्वम के अलावा पार्टी में दूसरा कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जब पार्टी को लीड कर सके। यही जमीनी स्थिति पार्टी को शशिकला की ओर ले गई अथवा ऐसे हालात तैयार किए गए। तथापि, सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा है कि अगर शशिकला इतनी काबिल थी, तो अम्मा ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी क्यों नहीं बनाया? शशिकला कभी पार्टी की सांसद अथवा एमएलए भी नही रही। इसके विपरीत 2011 में जयललिता ने शशिकला और उनके सभी नातों-रिश्तेदरों  को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था। यहां तक कि जया ने  शशिकला से गोद लिए पुत्र को भी बेदखल कर दिया था। तब जयाललिता का आरोप था कि शशिकला और उनके परिजनों ने उनके खिलाफ षंडयंत्र रचा है। एआईएडीएमके के अधिकांश  कार्यकर्ता शशिकला को अम्मा का उतराधिकारी चुने जाने पर खुश  नहीं है। कार्यकर्ता जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार को जयललिता का उत्तराधिकारी बनाने के पक्ष में है। पिछले साल सितंबर में जब जयललिता अस्पताल में भर्ती थी, तभी से पार्टी कार्यकर्ता दीपा के घर के बाहर तंबू गाडकर उन्हें राजनीति में उतरने की मांग कर रहे थे। हाल ही में दीपा ने राजनीति में प्रवेश  भी किया है और खुद को जयललिता का उतराधिकारी बताया है। इससे एआईएडीएमके के भीतर बगावत के सुर उठ सकते हैं। शशिकला  अम्मा नहीं बन सकती और न ही उनमें जयललिता जैसा स्पार्क है। तमिल नाडु में सिनेमा का राजनीति में जबरदस्त दखल रहा है। एमजीआर और जयललिता दोनों एक जमाने में तमिल सिनेमा के शीर्ष  कलाकर रहे हैं ओर इसी वजह उनकी लोगों में पकड भी थी। द्रमुक नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि भी तमिल सिनेमा से जुडे रहे हैं। शशिकला  सिनेमा से नहीं है। तमिल नाडु में शशिकला  भले ही जीत गई हों, मगर लोकतंत्र हार गया है।