उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार में अब तक का उग्र राजनीतिक विचार-विमर्श स्थापित मर्यादाओं को लांघ रहा है। शीर्ष नेताओं द्वारा तीखी भाषा में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत लांछन लगाना और निर्वाचन आयोग की आचार संहिता तक का उल्लघंन करना समकालीन भारतीय राजनीति का वीभत्स चेहरा उजागर करता है। लोकतंत्र में असहमति और विरोध को तर्कों के माध्यम से व्यक्त किया जाना चाहिए, असभ्य भाषा में नहीं। “गुजरात में गद्दों के लिए प्रचार“ न करें, “बसपा बहनजी संपत्ति पार्टी बन गई है “ अथवा “मोदी नेगटिव दलित मैन हैं“ जैसी भाषा को कतई शालीन नहीं कहा जा सकता। मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। अखिलेश यादव देश के सबसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री। दोनों ही संवैधानिक पद पर आसीन है। इस नाते दोनों से मर्यादित और शालीन भाषा की उम्मीद की जाती है। चुनाव प्रचार का यह कतई मतलब नहीं है कि संवैधानिक पद पर आसीन महापुरुष अपनी मर्यादा ही भूल जाएं। नरेन्द्र मोदी को “ विकास पुरुष कहा जाता है और वे देश की करोडों जनाकांक्षाएं को पूरा करने की अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं। अखिलेश यादव युवाओं के रोल मॉडल हैं। उन पर युवाओं की आकॉक्षाओं और अपेक्षाएं पर खरा उतरने की जिम्मेदारी है। सुश्री मायावती देश की निर्बल, शोसित और दलितों के लिए ”नई आशा की किरण” हैं। वे महिलाओं के लिए आगे बढने की प्रेरणा भी हैं। मगर “अमर्यादित“ आचरण अथवा असभ्य भाषा किसी भी “आदर्श “ राजनीतिक नेता को शोभा नहीं देती है। समकालीन नेताओं को याद रखना चाहिए कि यही वही देश है जिसमें जवाहर लाल नेहरु और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने उच्च आदर्श स्थापित किए थे। वैचारिक स्तर पर एक-दूसरे के कट्टर विरोधी होते हुए भी नेहरु और लोहिया ने कभी असभ्य भाषा का प्रयोग नहीं किया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। वाजपेयी के भाषण इतन ओजस्वी होते कि पार्टी के घुर विरोधी भी उन्हें सुनने आते। यह बेहद दुखद है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा चुनावी समर में आपत्तिजनक वक्तव्यों का सैलाब सा आ गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फतेहपुर की चुनावी रैली में श्मशान और कब्रस्तान का उल्लेख करते हुए समाजवादी पार्टी पर तंज कसा तो अखिलेश यादव ने “बिग बी की गुजरात पर्यटन के विज्ञापन” से मोदी को जवाब दिया। इस तरह की असभ्य भाषा का प्रयोग करके देश के नेता केवल मीडिया के माध्यम से सनसनी फैला रहे हैं। और मीडिया भी नमक-मिर्च लगाकर इसे प्रकाशित करने में कोई कसर नहीं छोड रहा है। इस तरह के चुनाव प्रचार से राजनीतिक दलों को कोई बडा लाभ नही मिल रहा है। देश के आंचलिक क्षेत्रों की जनता ऊल-जलूल तर्कों को समझती ही नहीं है। वह भावनाओं में बहकर अपना निर्णय लेती है। प्रधानमंत्री मतदाताओं की इस मानसिकता को बखूबी जानते हैं और इसीलिए उन्होंने फतेहपुर में बिजली की अनियमित सप्लाई के साथ-साथ श्मशान घाट और क्रबस्तान जैसे संवेदनशील विषयों का उल्लेख किया। सवाल यह है कि क्या यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नही है? काग्रेस ने इस पर निर्वाचन आयोग से शिकायत करने का फैसला लिया है। भाजपा उत्तर प्रदेश में मतदाताओं का धु्रवीकरण कराने की हरचंद कोशिश कर रही है। और इस मामले में मायावती भी पीछे नहीं है। वे अपनी चुनाव सभाओं में खुलकर धर्म और जात-पात के नाम पर वोट मांग रही है। इस मामले में कोई भी पीछे नहीं है। प्रत्याशियों का चयन भी इसी आधार पर हुआ है। लोकतंत्र का तकाजा है कि चुनावों को तर्कों और ठोस मुद्दों पर लडा जाना चाहिए। समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों ने हालांकि विकास को अपने चुनाव प्रचार का प्रमुख मुददा बना रखा है मगर चुनावी रैलियों में मंच पर पहुंचते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरु हो जाता है। अभी चुनाव प्रचार के चार चरण बाकी हैं और अगर चुनावी भाषणों का अमर्यादित सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो माहौल और अधिक तल्ख हो सकता है। इससे कानून-व्यवस्था भी बिगड सकती है।
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