देश परिवर्तन के नए दौर से गुजर रहा है। इस दौर में राजनीतिक आउटलुक , भाषा और संपर्क-संवाद के तौर-तरीकों में काबिलेगौर बदलाव लगभग हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। भारतीय मतदाता अब काफी सयाना हो गया है। उसे लोक-लुभावने वायदों के चुनावी अस्त्रों से मूर्ख नहीं बनाया जा सकता और न ही गपोडशंखी बातों से। नागनाथ और सांपनाथ के बीच का अंतर उसे भली-भांति मालूम है। नवंबर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नोटबंदी किए जाने के बाद से अब तक सपन्न हुए सभी निकाय चुनावों में भाजपा को प्रचंड जनादेश मिलना यही दर्शाता है। चंडीगढ नगर निगम चुनाव हों या ओडीशा और महाराष्ट्र निकाय चुनाव, भाजपा ने हर जगह शानदार जीत दर्ज की है। महाराष्ट्र के ताजा निकाय चुनाव में शिवसेना की बैशाखी छोडकर अपने बूते चुनाव लड कर 10 मेंसे 8 में भाजपा शिवसेना को पीछे छोड सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी है। ग्रेटर मुंबई महानगर पालिका चुनाव में इस बार भाजपा ने अकेले चुनाव लडा और 232 में 82 सीटें जीतकर शिवसेना की बराबरी की है। शिवसेना को 84 सीटें मिली है। पिछली बार भाजपा मात्र 31 सीटें जीत पाई थीं। मुंबई को शिवसेना का गढ माना जाता है और शिवसेना के साथ-साथ राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) भी इसी मुगालते में थीं कि मुंबई में ठाकरे परिवार के समक्ष कोई नहीं टिक सकता। भाजपा ने शिवसेना और एमएनएस का यह भ्रम भी तोड दिया। इससे पहले भाजपा ने विधानसभा चुनाव भी अकेले अपने दम पर लडा था, और स्पष्ट बहुमत के करीब पहुंचकर अपनी सरकार बना ली हालांकि शिवसेना इसमें शामिल है। सबसे ज्यादा दुर्गति कांग्रेस की हुई है। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी लगातार हार का मुंह देख रही है। मुबंई महानगर पालिका के चुनाव में भाजपा और शिवसेना के अलग-अलग चुनाव लडने से कांग्रेस को उम्मीद थी, उसे वोटों के बंटवारे का लाभ मिलेगा मगर ऐसा होना तो दीगर रहा, उसे मात्र 31 सीटें मिली हैं। पिछली बार 2012 में कांग्रेस ने 51 और 2007 में 75 सीटें जींती थी। शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को मात्र 9 सीटें मिली हैं। बीएमसी चुनाव में एंटी-इंकूबेंसी फेक्टर भी नहीं चला। पिछले दो दशक से बीएमसी पर भाजपा- शिवसेना का कब्जा रहा है। सडकों पर बडे-बडे गड्ढों, लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम और मलेरिया का प्रकोप मुंबई को बीस साल सताता रहा है मगर इसके बावजूद भी मुंबईवासियों ने भाजपा और शिवसेना को ही चुना। यही स्थिति चंडीगढ नगर निगम चुनाव में सामने आई। नोटबंदी के बाद चुनाव परिणामों का निष्कर्ष यही निकलता है कि जनता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों पर विपक्षी नेताओं से कहीं ज्यादा भरोसा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का मोदी के खिलाफ आग उगलना भी मतदाताओं को कतई पसंद नहीं आया है। कांगेस यह बात भूल गई है कि सतहर और अस्सी के दशक में जब भाजपाई समेत विपक्ष इंदिरा गांधी के खिलाफ जितनी ज्यादा आग उगलते, वे मतदाताओं की उतनी ही ज्यादा प्रिय हो जाती थीं। पीडित और दुर्बल के प्रति भारतीय जनमानस की हमेशा से गहरी सहानुभूति रही है। जनमानस में प्रधानमंत्री मोदी की छवि आज भी “चाय बेचने वाली“ ही है। नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष और बुद्धिजीवियों की प्रखर आलोचना के बावजूद जनता इसे धनाढय वर्ग और काले धन के खिलाफ जनहित की कार्रवाई मान रही है। ठीक उसी तरह, जिस तरह साठ और सतहर के दशक में इंदिरा गांधी की बैंको के राष्ट्रीयकरण की कार्रवाई को आम जनता ने पूंजीपतियों के खिलाफ बडी कार्रवाई माना था। आम आदमी आंकडों और तथ्यों के मायाजाल को नहीं समझता। बहरहाल, महाराष्ट्र निकाय चुनाव के ताजा परिणाम साफ-साफ बता रहे हैं कि चुनावी बयार किस ओर बह रही है। इन चुनाव परिणामों से इस बात का भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चुनावी बयार किस ओर बह रही है़?
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