भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रधुराम राजन की असभ्य और अमर्यादित विदाई ने देश को जता दिया है कि भद्र लोगों और स्वतंत्र सोच रखने वाले बुद्धिजीवियों के लिए " निहित स्वार्थी“ मौजूदा परिवेश में कोई जगह नहीं है। और भगवा पार्टी के शासन में तो कतई नहीं। गैर-भगवाधारी भगवा पार्टी की आंख की सबसे बडी किरकिरी माने जाते हैं। रघुराम राजन भी भगवा पार्टी के लिए बाहर के व्यक्ति थे और उनकी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र कार्यशैली भाजपाइयों को रास नहीं आ रही थी। इस सच्चाई के चलते रघुराम राजन का जाना तय था और राजन खुद मोदी सरकार के सत्ता मे आने के बाद से ही इस स्थिति के लिए पूरी तरह से तैयार भी थे । वैसे भी जमाने का चलन है कि सामान्य बुद्धि वाले सियासतदान असाधारण प्रतिभा को कभी बर्दाश्त नहीं करते हैं । रघुराम राजन 1991 के बाद आरबीआई के पहले ऐसे गवर्नर हैं जिन्हें दूसरी कार्यकाल नहीं दिया गया है। पिछले कुछ समय से जिस तरह भगवा पार्टी के लोग उनके पीछे पडे हुए थे, उससे साफ था कि राजन को चलता करने के लिए माहौल तैयार किया जा रहा है। भाजपा के बडबोले नेता सुब्रमण्यन स्वामी ही नही, भगवा पार्टी के और भी कई नेता राजन के पीछे हाथ धोकर पडे हुए थे और जाहिर यह सब शीर्ष नेताओ की सहमति से किया जा रहा था। यह बात नौसिखिया भी जानता है कि अगर उच्च पद पर आसीन भद्र व्यक्तित्व को सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया जाए, तो उसके पास पद छोडने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता है। साफ-सुथरी छवि ही भद्र व्यक्ति की सबसे बडी पूंजी होती है। खुद को सबसे अधिक अनुशासित कहने वाली भाजपा का अनुशासन भी वाकई कमाल का है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सरेआम उच्च पद पर आसीन व्यक्तियों को भला-बुरा कहते रहते हैं मगर नेतृत्व चुपचाप तमाशा देखता रहता है। आरबीआई देश की प्रतिष्ठित्त वित्त मंत्रालय से संबंधित स्वायत्त संस्था है और इस नाते रघुराम के बवाव में आगे आना वित्त मंत्री अरुण जेटली का नैतिक दायित्व था। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। माना कि शासक दल को किसी को नियुक्त करने अथवा हटाने का पूरा अधिकार होता है, मगर ऐसा मर्यादा में रहकर ही किया जाना चाहिए है। रघुराम राजन का कसूर यह है कि बतौर आरबीआई गवर्नर उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए गंभीरता से प्रयास किए, और सरकार की “हां में हां“ नहीं मिलाई। उनकी उच्च ब्याज दर वाली सख्त मौद्रिक नीति को लेकर अर्थशास्त्रियों में मतभेद हो सकते हैं मगर राजन की नीयत पर किसी को शक नहीं है। राजन ने बेलगाम और करप्शन का पर्याय बने सरकारी बैंको पर नकेल डालने की भरपूर कोशिश की और इसके सकारात्मक परिणाम भी दिखे। तथापि दलाल और निहित स्वार्थी सियासी नेता राजन की कार्यशैली को पचा नहीं पाए और उनके पीछे पड गए। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता के लिए भी राजन को ही बलि का बकरा बनाया गया है। संघ परिवार राजन की सख्त मौद्रिक नीति को महंगाई के लिए दोषी मानता है। भाजपा मानती है कि महंगे कर्ज के कारण ही देश में महंगाई बढी है जबकि सच यह है कि महंगाई के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार है। सस्ते तेल के बावजूद न तो भाडा कम हुआ और न ही फ्यूल की कीमतें। सस्ते तेल का अधिकतर फायदा सरकार डकार गई। पिछले एक साल से जमाखोरी और कालाबाजारी के कारण दालों की कीमतें आसमान को छू रही हैं मगर सरकार ने कोई एहतियातन कदम नहीं उठाए। इन हालात में बाजार में और ज्यादा तरलता आने से कालाबाजारी और जमाखोरी और बढ जाती। कोई भी व्यक्ति किसी संस्था से बडा नहीं होता। गवर्नर आते-जाते रहेंगे। रघुराम राजन खुद ऐसा कह रहे हैं। रिजर्व बैंक राजन के बगैर भी निर्बाध रुप से चलेता रहेगा मगर उनकी अमर्यादित विदाई आरबीआई को सालों तक अस्वस्थ बनाए रखेगी।
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