राहुल गांधी को माताश्री सोनिया गांधी की जगह पार्टी की पूृरी कमान सौंपी जाए या अभी नहीं, लंबे समय से कांग्रेस पार्टी इसी दुविधा में है। समय गुजरने के साथ-साथ कांग्रेस की यह दुविधा उतरोत्तर बढती ही जा रही है। दरअसल, कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की दुविधा की असली वजह भी “दुविधा“ है। कांग्रेस को मौजूदा मरणासन्न स्थिति से उभारने के लिए उन्हें लोक लुभावने नेतृत्व की जरुरत है। इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस को उनके जैसा आकर्षक नेतृत्व नहीं मिल पाया है। इंदिरा गांधी में गजब का स्पार्क था। उनकी हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी में वह स्पार्क था मगर 1991 में राजीव गांधी की हत्या ने कांग्रेस को फिर लोक लुभावने नेतृत्व से वंचित कर डाला। बीच में कांग्रेस ने सीता राम केसरी जैसे खांटी नेता को भी आजमाया मगर भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी के मुकाबले वे कहीं टिक नहीं पाए। पीवी नरसिंह राव का नेतृत्व भी बेअसर साबित हुआ। थक-हार कर कांग्रेस को फिर नेहरु-इंदिरा गांधी परिवार की शरण में आना पडा और 1998 से सोनिया गांधी पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हालांकि अपने बूते आज तक स्पश्ट बहुमत तो नहीं मिला मगर पार्टी क्षेत्रीय दलों के सहयोग से 2004 से 2014 तक लगातार केन्द्र में स्त्तारूढ होती रही है। सोनिया गांधी 2004 में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार का प्रधानमंत्री पद ठुकरा जनमानस में “वलिदान की देवी भी बनी और इसी छवि के चलते कांग्रेस को 2009 में क्षेत्रीय दलों के साथ सरकार बनाने का जनादेश भी मिला पर घोटाला-दर-घोटाले ने संप्रग की लुटिया डूबो दी। 2014 के लोकसभा चुनाव और तदुपरांत एक के बाद दूसरे विधानसभा वुनाव में पार्टी की करारी हार ने कांग्रेस को मरणासन्न स्थिति में ला खडा कर दिया है। देश की सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी का उत्तर प्रदेश , बिहार, पष्चिम बंगाल, तमिल नाडु, गुजरात और ओडीशा से सुपडा साफ हो चुका है। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी पार्टी का बचा-खुचा जनाधार जाता रहा है। महाराष्ट्र में कांग्रेस पहले ही शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पल्लू से बंधी हुई है। आंध्र प्रदेश में भी पार्टी के जनाधार को कांग्रेस के दिग्गज नेता वाईएसआर (वाई एस राजशेखर रेड्डी) के पुत्र जगन रेड्डी की पार्टी कमजोर कर चुकी है। पूरे देश में कर्नाटक एकमात्र बडा राज्य है, जहां कांग्रेसा सत्ता में है। हाल ही के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस असम और केरल में भी सत्ता से बाहर हो गई। काग्रेस की यही दुविधा है। कांग्रेस ने 2014 का लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनाव राहुल गांधी और सोनिया गांधी के नेतृव में लडे हैं मगर हर बार पार्टी को करारी हार का सामना करना पडा है। अगले साल के शुरु में उत्तर प्रदेश , पंजाब और उतराखंड में विधान सभा चुनाव होने है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस भाजपा, बसपा, सपा के बाद कहीं जाकर चौथे नंबर पर है, इसलिए इस राज्य में पार्टी को करिशमाई नेतृत्व ही मरणासन्न स्थिति से उबार सकता है। पंजाब मे पार्टी सत्ता की प्रमुख दावेदार है मगर अरविंद केजरीवाल की “आप“ इस राज्य मे भी पार्टी को कडी चुनौती पेश कर रही है। कांग्रेस के पास कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के अलावा कोई लोक लुभावी नेता नहीं है। उत्तराखंड में भी पार्टी को भाजपा के दिग्गज नेताओं से कडी चुनौती का सामना करना पड सकता है। और अगर पंजाब, उतराखंड और उसके बाद हिमाचल प्रदेश भी कांग्रेस के हाथ से निकल जाता है, तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश कांग्रेस से मुक्त हो जाएगा और यही भाजपा का लक्ष्य भी है। कांग्रेस को इस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोक-लुभावने नेतृत्व का मुकाबला करने के लिए करिश्माई नेतृत्व की जरुरत है। राहुल गांधी भले ही हाल ही के चुनाव में करिश्माई नेतृत्व की खूबियां नहीं दिखा पाए, मगर उनमें वह स्पार्क है और इसे चिंगारी बनने की देर है। कांग्रेस के पास इसके सिवा चारा भी नहीं है। राहुल की बहन प्रियंका गांधी उनसे अधिक करिश्माई और लोक लुभावी है मगर वे कांग्रेस का आखिरी तुरुप है। अब वक्त आ गया है कि कांग्रेस अब और तब की दुविधा छोडकर राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंप दें।
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