गुरुवार, 9 जून 2016

India Untold Story: Rich Getting More Richer....

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रिजर्व  बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने इस बार कर्ज सस्ता करने की बजाए व्याज दरों को यथावत रखकर मुद्रा स्फीति नियंत्रण पर फोकस किया है। राजन का तर्क  है कि रिटेल इंफ्लेशन अभी भी निर्धारित सीमा से कहीं ज्यादा है और  जब तक यह नियंत्रण में नहीं आ जाता, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद नहीं की जा सकती। और अगर कटौती की भी जाती है, देश  में “बनिया“ मानसिकता वाले बैंक सस्ते ब्याज का लाभ आम ग्राहक को पास ऑन करने की बजाए  अपना मुनाफा बढाने में इस्तेमाल करेगें। मंगलवार को अपनी ताजा मौद्रिक नीति जारी करते हुए आरबीआई ने रेपो-रेट को 6.5 फीसदी पर यथावत रखा है। यह पांच साल के निम्न स्तर पर है। पिछले करीब डेढ साल में  रघुराम राजन ब्याज में 1.5 फीसदी की कटौती कर चुके हैं मगर देश  के अधिकांश  बैंक इस राहत को खुद ही हजम कर गए  हैं।   होम लोन्स  के कर्जदारों को  बमुश्किल  आधा (0.50) फीसदी ब्याज की राहत देते हुए भी बैंकों  के  हाथ-पांव फूल गए हैं। बाकी 1 फीसदी ब्याज सरकारी बैंकों समेत अधिकांश  बैंक खुद डकार गए हैं। और उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं है। रेपो रेट के बढाए जाने से बैंक ब्याज बढाने में एक दिन का भी समय नहीं लगाते हैं मगर रेपो रेट कम किए जाने की सूरत में उन्हें सांप सूंघ जाता है। अनुमान है कि पांच साल पहले के फ्लोटिंग ब्याज दरों पर होम लोन्स के ग्राहकों की जो ईएआई थी, वही आज लगभग सालाना 36,000 रु ज्यादा है। और बैंक ग्राहकों को राहत देने की बजाए उनसे सालाना इतनी रकम लूट रहे हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की यही सबसे बडी नीतिगत विफलता है। राजन जमीनी सच्चाई की लिखावट को पढ नहीं पाए और मुद्रा स्फीति पर अधिकतर हवा में तीर मारते रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ  नेता और अर्थशास्त्री डाक्टर सुब्रमनयम स्वामी के इन आरोपों में वजन है कि खालिस देसी होते हुए भी राजन आम आदमी की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए। उनकी मानसिकता उनके  अमेरिकी ग्रीन कार्ड  जैसी ही है।   महंगाई से जूझ रहे आम आदमी के लिए होम लोन में मामूली राहत भी मायने रखती है। तेल की कीमतों में अत्याधिक गिरावट के बावजूद न तो खाद्यान्न महंगाई कम हुई और न ही कर्ज सस्ता हुआ। सस्ते तेल का पूरा-पूरा फायदा सरकार ने अपनी जेब भर कर बटोर लिया और सस्ते कर्ज (रेपो रेट) का फायदा बेंकों ने डकार लिया। मोदी सरकार के राज में आम आदमी बेचारा इस उम्मीद में  जीता रहा कि आज नहीं तो कल कर्ज सस्ता होगा ही क्योंकि प्रधानमंत्री ने अच्छे दिन लाने का वायदा कर रखा है। रघुराम राजन के कार्यकाल के तीन साल बीत गए मगर न तो खाद्य महंगाई कम हुई है और न ही होम लोन की ईएमआई। इस सितंबर में बतौर रिजर्व बैंक गवर्नर राजन का तीन साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। आम ग्राहक को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि रघुराम राजन की नीतियों से मुद्रा-स्फीति कम हुई है और सुस्त पडी अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकडी है। पहले की अपेक्षा स्टॉक मार्केट गुलजार हुई है और देश  की क्रेडिट रेटिंग सुधरी है। उसके लिए यह सब किताबी बातें हैं। आम आदमी सिर्फ  यह जानना चाहता है कि खाद्य महंगाई कितनी कम हुई है, उसकी क्रय शक्ति (परचेजिंग पॉवर) कितनी बढी है और उसकी जरुरतों को पूरा करने के लिए कर्ज  कितना सस्ता है। और इन सब बातों का सीधा-सीधा सरोकार रिजर्व  बैंक से है। महंगाई को कम करना आरबीआई की नीतिगत जिम्मेदारी है। आरबीआई ही मार्केट में लिक्वडिटी को नियंत्रित करता है। ब्याज दरें भी वही तय करता है। महंगाई बढाने-घटाने में इन दोनों का प्रमुख योगदान रहता है। हाल ही में जारी रैकिंग के अनुसार भारत को अब वर्ल्ड बैंक ने  विकासशील देश  से हटाकर लोअर मिडल इंकम (गरीब) देशों  की श्रेणी में  शुमार किया है। यानी भारत का स्तर गिरा है, उठा नहीं है। इसका यही अर्थ निकलता है कि भारत में गरीबी बढी है, कम नहीं हुई है। यानी समान विकास की बजाय पक्षपाती तरक्की हुई है। अमीर और ज्यादा अमीर हुआ है और गरीब, गरीबतम होता गया। आजादी के सात दशक बाद यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। गरीब देश  में अगर कर्ज  महंगा होगा, तो कैसे होगा समान विकास? देश  को आगे बढाना है तो कर्ज सस्ता करना ही होगा।