गुरुवार, 16 जून 2016

जीएसटी पर सहमति

मंगलवार को राजधानी दिल्ली में राज्यों के वित्त मंत्रियों से विस्तृत चर्चा के बाद केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेट्ली ने दावा किया है कि तमिल नाडु को छोडकर बाकी सभी राज्यों ने लंबे समय से संसद की धूल चाट रहे गुडस एंड सर्विसिस टैक्स को अविलंब लागू करने पर सहमति जताई है। राज्यों के वित्त मंत्रियों की सर्व अधिकार सपन्न (एम्पॉवर्ड  कमेटी) समिति की बैठक में 29 मेंसे 22 राज्य की मौजूदगी ही अपने आप में रिकॉर्ड है। इससे लगता है जीएसटी का रास्ता प्रशस्त हो गया है हालांकि अभी भी इसे कई अवरोधक लांघने है। वित्त मंत्री को उम्मीद है कि मॉनसून सत्र में जीएसटी बिल पारित हो जाएगा। संवैधानिक संशोधन बिल के पारित होने के बाद केद्र सरकार को संसद से जीएसटी बिल पारित कराना होगा। राज्यों को विधानसभा में जीएसटी बिल पारित करवाना होगा। जीएसटी लागू करवाने के लिए कम-से-कम पचास फीसदी विधानसभाओं की मंजूरी संवैधानिक तौर पर अनिवार्य  है। इसमें खासा समय लग सकता है। जीएसटी सभी के हित में है, यह जानते हुए भी राज्य और सियासी दल, इसे पारित होने नहीं दे रहे हैं। सबसे बडा अवरोधक कांग्रेस ने खडा कर रखा है। कांग्रेस जीएसटी बिल में सीलिंग (अधिकतम सीमा) की संवैधानिक व्यवस्था चाहती है। कांग्रेस इस सीमा को 18 फीसदी निर्धारित करने के पक्ष में है। सरकार ने इसे मान भी लिया है मगर अधिकांश  राज्य जीएसटी की अधिकतम सीमा के पक्ष में नहीं है। करीब-करीब सभी राज्य मानते है कि  आने वाले समय में इसे बढाने की जरुरत पड सकती है। पहले जीएसटी में इंटर-स्टेट गुडस और सर्विसिस पर एक फीसदी कर लगाने का प्रस्ताव था। उधोग और व्यापार जगत इसका मुखर विरोध कर रहा था। कांग्रेस भी इस कर को निरस्त करने के पक्ष में थी। सरकार ने इसे वापस ले लिया। कांग्रेस जीसटी मामलों के निपटान के लिए स्वायत्त व्यवस्था की भी पैरवी कर रही थी। यह भी मॉडल  बिल में समाहित है। कांग्रेस हालांकि अभी भी पूरी तरह से संतुष्ट  नहीं है मगर इस मामले में वह अलग-थलग पड चुकी है और उसके पास जीएसटी बिल पर सरकार का साथ देने के सिवा कोई चारा नहीं है। और अगर कांग्रेस अब भी विरोध पर अडी रही, तो यही माना जाएगा कि पार्टी जीएसटी का विरोध मुद्दों पर नहीं, सिर्फ सरकार का विरोध करने के लिए कर रही है। बहरहाल, तमिल नाडु अभी भी अपनी बात पर अडा हुआ है। तमिल नाडु  को आशंका है कि जीएसटी के लागू होने से राज्य को खासा वित्तीय नुकसान होगा। इसके अलावा तमिल नाडु को “वित्तीय स्वायतता“ के खो जाने का भी डर है। जीएसटी की पूरी व्यवस्था केन्द्र सरकार के हाथ मे होगी। इसी भय के चलते  संवेदनषील मुद्दों पर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। इनमें जीएसटी के तहत रेवेन्यू न्यूट्रल रेट  सबसे अहम मुददा है। सभी राज्य चाहते हैं कि जीएसटी के लागू होने के बाद उन्हें किसी तरह का राजस्व नुकसान नहीं होना चाहिए। वित्त मंत्री ने राज्यो को आश्वत  किया है कि सरकार इस बात का पूरा ख्याल रखेगी मगर राज्य इस पर वैधानिक व्यवस्था चाहते हैं। व्यापारियों के लिए दोहरे कंट्रोल का मामला अभी भी सुलझा नहीं है। जीएसटी के तहत बिजनेसमैन को सेंट्रल और स्टेट दोनों जगह रिटर्न फाइल करनी पडेगी। जुलाई में होने वाली वित्त मंत्रियों की एम्पावर्डक कमेटी की बैठक में  इन मुद्दों का तोड निकाला जा सकता है। मंगलवार को मॉडल जीएसटी पर सहमति बनना बैठक की बडी उपलब्धि है। इसके तहत टैक्स उस जगह लगेगा, जहां गुडस या सर्विस की प्रथम ट्रांजैक्शन  होगी। इससे स्थिति स्पष्ट  हो गई है। मॉडल जीएसटी कानून में नियमों का उल्लघंन करने पर पांच साल की कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान है। टैक्स चुकाने के पात्र व्यक्ति अथवा कारोबारी को खुद देय टैक्स का आकलन और रिटर्न भरना होगा। वार्षिक  दस लाख से ज्यादा कारोबार करने पर ही जीएसटी चुकाना होगा। सिक्किम और पूर्वोतर राज्यों के लिए यह सीमा पांच लाख है।  उपभीक्ताओं के लिए अलग से कोष  बनेगा। मॉडल  कानून में और भी कई अच्छी बाते हैं। बहरहाल, यह स्थिति बेहद सुखद है कि जीएसटी पर धीरे-धीरे ही सही मगर राज्यों और केन्द्र में अधिकतर मामलों में सहमति बन रही है। इस साल जीएसटी भले ही लागू नहीं हो पाए मगर अगले साल इसके लागू होने की उम्मीद की जा सकती है।