तेज रफ्तार से उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में 7.9 ग्रोथ दर्ज कर पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि वैश्विक मंदी के बावजूद उसके फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं। पिछली तिमाही की इस शानदार ग्रोथ ने अर्थशास्त्रियों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। यह विशेषज्ञ के आकलन से ज्यादा है। चोथी तिमाही में 7.5 फीसदी ग्रोथ अपेक्षित थी। इतना ही नहीं भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरऑल ग्रोथ 7.6 को छू रही है। 2014-15 में यह 7.4 फीसदी थी। यह भी दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था चीन की ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। जनवरी-मार्च की तिमाही में चीन की ग्रोथ 6.7 फीसदी रही है। 2015-16 में कोर सेक्टर की ग्रोथ 8.5 फीसदी रही है। प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इंकम) में भी 7.4 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2014-15 की 86,879 रु की तुलना में 2015-16 में यह बढकर 93,293 रु हो गई है। यानी चौतरफा अच्छी खबर है और खुशाहली और तरक्की का माहौल है। पूरी दुनिया में इस समय मंदी का माहौल है और बडी-बडी अर्थव्यवस्थाएं भी अपेक्षित विकास दर को हासिल नहीं कर पा रही है। कनाडा की विकास दर पहली तिमाही में मात्र 0.6 फीसदी रही है और वार्षिक दर 2.4 फीसदी। इस अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स कमजोर पड गए हैं। दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था अमेरिका की जनवरी-मार्च तिमाही की ग्रोथ भी मात्र 0.8 फीसदी रही है। यूरोपियन देशों का और भी बुरा हाल है। जर्मनी की पहली तिमाही की गोर्थ 0.7 फीसदी रही और इग्लैंड की 0.4 फीसदी। इस साल की पहली तिमाही में रुस की ग्रोथ दर 1.2 फीसदी, ब्राजील की 1.4 और दक्षिण अफ्रीका की 0.50 फीसदी रही है । यूरोप में सस्ता कर्ज होने के बावजूद आर्थिक गतिविधियों रफ्तार नहीं पकड पा रही है। पूरी दुनिया में भारत और चीन दो ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जो औरों की तुलना में अपेक्षाकृत तेज रफतार से आगे बढ रही हैं और इस मामले में भारत ने चीन को भी पछाड दिया है। पिछले दो सालों से लगातार सूखे के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरऑल 7.6 गोर्थ रेट काबिलेतारीफ है। इसका श्रेय मोदी सरकार को जाता है। पिछले सप्ताह 26 मई को मोदी सरकार के दो साल पूरे हुए हैं। अगर दो साल में सूखे और राजनीतिक अडंगों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढती है, तो निष्कर्ष यही निकलता है कि सरकार की परफोर्मेस बेहतर रही है। जीडीपी की ग्रोथ रेट में और तेजी आ सकती है अगर गुडस एंड सर्वसिस टैक्स (जीएसटी) लागू हो जाता। इस जून से जीएसटी को पूरे देश में लागू किया जाना है मगर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की जिद्द के कारण जीएसटी बिल अभी भी राज्यसभा में अटका हुआ है। जीएसटी के लागू होने से पूरे देश में एक समान टैक्स व्यवस्था प्रभावी होगी और इससे सभी तरह के गुडस पर 25 से 30 फीसदी कर भार कम हो जाएगा। इससे उत्पादन में अप्रत्याशित इजाफा हो सकता है। विशेषज्ञो का आकलन है कि जीएसटी के लागू होने से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 1.5 से 2 फीसदी का इजाफा हो सकता है। यानी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने जीएसटी बिल को रोककर देश को दो फीसदी जीडीपी से वंचित किया है। ऐसी सियासत के क्या मायने जो देश का खासा नुकसान करे। पूरे देश में जीएसटी को एक अप्रैल, 2010 से लागू होना था मगर मौजूदा टकराव से साफ है कि इस साल जून से भी जीएसटी लागू नहीं हो पाएगा। जीएसटी ही नहीं आार्थिक सुधारों को लेकर और भी कई अहम मामले हैं जो विपक्ष के अडियल स्टैंड के कारण बेवजह रुके पडे हैं। लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं का तकाजा है कि जीएसटी जैसे अहम जनहित के मामलों में सत्ता पक्ष और विपक्ष में सहमति होनी चाहिए। जनहित के मामलों को राजनीति का शिकार नहीं बनने दिया जाना चाहिए। बहरहाल, ताजा आंकडे यही कह रहे हैं कि मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड काफी अच्छा रहा है और इस दौरान देश आगे बढा है।
गुरुवार, 2 जून 2016
इंडिया शाइनिंग
Posted on 7:57 pm by mnfaindia.blogspot.com/
तेज रफ्तार से उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में 7.9 ग्रोथ दर्ज कर पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि वैश्विक मंदी के बावजूद उसके फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं। पिछली तिमाही की इस शानदार ग्रोथ ने अर्थशास्त्रियों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। यह विशेषज्ञ के आकलन से ज्यादा है। चोथी तिमाही में 7.5 फीसदी ग्रोथ अपेक्षित थी। इतना ही नहीं भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरऑल ग्रोथ 7.6 को छू रही है। 2014-15 में यह 7.4 फीसदी थी। यह भी दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था चीन की ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। जनवरी-मार्च की तिमाही में चीन की ग्रोथ 6.7 फीसदी रही है। 2015-16 में कोर सेक्टर की ग्रोथ 8.5 फीसदी रही है। प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इंकम) में भी 7.4 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2014-15 की 86,879 रु की तुलना में 2015-16 में यह बढकर 93,293 रु हो गई है। यानी चौतरफा अच्छी खबर है और खुशाहली और तरक्की का माहौल है। पूरी दुनिया में इस समय मंदी का माहौल है और बडी-बडी अर्थव्यवस्थाएं भी अपेक्षित विकास दर को हासिल नहीं कर पा रही है। कनाडा की विकास दर पहली तिमाही में मात्र 0.6 फीसदी रही है और वार्षिक दर 2.4 फीसदी। इस अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स कमजोर पड गए हैं। दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था अमेरिका की जनवरी-मार्च तिमाही की ग्रोथ भी मात्र 0.8 फीसदी रही है। यूरोपियन देशों का और भी बुरा हाल है। जर्मनी की पहली तिमाही की गोर्थ 0.7 फीसदी रही और इग्लैंड की 0.4 फीसदी। इस साल की पहली तिमाही में रुस की ग्रोथ दर 1.2 फीसदी, ब्राजील की 1.4 और दक्षिण अफ्रीका की 0.50 फीसदी रही है । यूरोप में सस्ता कर्ज होने के बावजूद आर्थिक गतिविधियों रफ्तार नहीं पकड पा रही है। पूरी दुनिया में भारत और चीन दो ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जो औरों की तुलना में अपेक्षाकृत तेज रफतार से आगे बढ रही हैं और इस मामले में भारत ने चीन को भी पछाड दिया है। पिछले दो सालों से लगातार सूखे के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरऑल 7.6 गोर्थ रेट काबिलेतारीफ है। इसका श्रेय मोदी सरकार को जाता है। पिछले सप्ताह 26 मई को मोदी सरकार के दो साल पूरे हुए हैं। अगर दो साल में सूखे और राजनीतिक अडंगों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढती है, तो निष्कर्ष यही निकलता है कि सरकार की परफोर्मेस बेहतर रही है। जीडीपी की ग्रोथ रेट में और तेजी आ सकती है अगर गुडस एंड सर्वसिस टैक्स (जीएसटी) लागू हो जाता। इस जून से जीएसटी को पूरे देश में लागू किया जाना है मगर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की जिद्द के कारण जीएसटी बिल अभी भी राज्यसभा में अटका हुआ है। जीएसटी के लागू होने से पूरे देश में एक समान टैक्स व्यवस्था प्रभावी होगी और इससे सभी तरह के गुडस पर 25 से 30 फीसदी कर भार कम हो जाएगा। इससे उत्पादन में अप्रत्याशित इजाफा हो सकता है। विशेषज्ञो का आकलन है कि जीएसटी के लागू होने से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 1.5 से 2 फीसदी का इजाफा हो सकता है। यानी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने जीएसटी बिल को रोककर देश को दो फीसदी जीडीपी से वंचित किया है। ऐसी सियासत के क्या मायने जो देश का खासा नुकसान करे। पूरे देश में जीएसटी को एक अप्रैल, 2010 से लागू होना था मगर मौजूदा टकराव से साफ है कि इस साल जून से भी जीएसटी लागू नहीं हो पाएगा। जीएसटी ही नहीं आार्थिक सुधारों को लेकर और भी कई अहम मामले हैं जो विपक्ष के अडियल स्टैंड के कारण बेवजह रुके पडे हैं। लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं का तकाजा है कि जीएसटी जैसे अहम जनहित के मामलों में सत्ता पक्ष और विपक्ष में सहमति होनी चाहिए। जनहित के मामलों को राजनीति का शिकार नहीं बनने दिया जाना चाहिए। बहरहाल, ताजा आंकडे यही कह रहे हैं कि मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड काफी अच्छा रहा है और इस दौरान देश आगे बढा है।






