बुधवार, 22 जून 2016

आर्थिक सुधारों की ओर !


 मौदी सरकार ने रक्षा और नागरिक उडडयन क्षेत्रों में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  (एफडीआई) की अनुमति देकर  शिथिल पडे आर्थिक सुधारों को गति देने का प्रयास किया है। सरकार के इस फैसले से “मेक इन इंडिया“ को भी बढावा मिल सकता है और सैन्य उपकरणों की टेकनॉलॉजी के भारत में आने से देश  में रोजगार के अवसर भी सृजित हो सकते हैं। लंबे समय से मंदी से पीडित देसी नागरिक उडडयन क्षेत्रों को वास्तव में निवेश  की दरकार है ओर इससे उन लो-फेयर केरियर एयरलाइंस को प्रत्यक्ष विदेश  निवेश  की संजीवनी बुटि मिल सकती है जो अस्तित्व में आने के बाद लगातार घाटे में चल रही है। शराब करोबारी विजय माल्या की किंगफिशर कंपनी के डूबने के बाद और माल्या द्वारा बेंकों का नौ हजार करोड रु का कर्ज नहीं चुकाने  पर वित्तीय सस्थाएं एयरलाइंस को कर्ज देने में आनाकानी कर रही हैं। बहरहाल, नागरिक उड्डयन क्षेत्र से कहीं ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  रक्षा क्षेत्र में आ सकता है। भारत दुनिया में रक्षा उपकरण खरीदने वाला दुनिया का सबसे बडा देश  है। हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय भारत का रक्षा आयात चीन, पाकिस्तान और तेल की कमाई से लब्बालब सउदी अरब से भी तीन गुना ज्यादा है। स्टॉकहॉम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीटयुट का आकलन है कि भारत औसतन हर साल दुनिया के 15 फीसदी रक्षा उपकरण खरीदता है।  उसका रक्षा आयात 140 फीसदी बढ रहा है। 2005-2009 के दरम्यान जहां भारत का रक्षा आयात चीन से 23 फीसदी कम था, अब यह चीन से तीन गुना अधिक है।  अमेरिका  ने रक्षा उपकरण और हथियार बेच-बेच कर खूब कमाई की है। कहते हैं अपनी रक्षा उपकरणों के उधोग को फलते-फूलते रखने के लिए अमेरिका ने सालों तक कई देशॉ  को युद्ध की भठ्ठी में झोंका रखा और आज भी वही कर रहा है। पाकिस्तान अब भी अमेरिका के लडाकू एफ-सोलह जहाजों को सस्ते दामों (सब्सिडायज्ड) पर खरीदने के लिए मरा जा रहा है। भारतीय दबाव के कारण  अमेरिका इस बार पाकिस्तान को एफ-सोलह विमान नहीं बेच पाया है। अपने रक्षा उधोग के हितों की खातिर अमेरिका गरीब देशॉ  को सस्ते दामों पर रक्षा उपकरण बेचकर उन पर एहसान जताता रहा है।  मोदी सरकार ने रक्षा में सौ फीसदी एफडीआई की अनुमति देकर रक्षा उपकरणों के उत्पादन के विदेशी  द्धार खोल दिए हैं। मगर सरकार की हां भर से रक्षा उत्पादन में विदेशी  निवेश  और टेकनॉलॉजी ट्रांसफर होने से रहा।  रक्षा क्षेत्र में इस समय 49 फीसदी की अनुमति है मगर बहुत कम लोगों को मालूम है कि “ स्टेट ऑफ दी आर्ट टेकनॉलॉजी“ में पहले से सौ फीसदी एफडीआई को मंजूरी दी जा चुकी है। इसके बावजूद रक्षा क्षेत्र में  आज तक एक पैसे की “स्टेट ऑफ दी आर्ट टेकनॉलॉजी“ नहीं आ पाई है। इसकी वजह यह है कि सरकार आज तक यह स्पष्ट  नहीं कर पाई है कि  “स्टेट ऑफ दी आर्ट“ है क्या? मौजूदा सरकार को भी अभी  आधुनिक और प्रोन्नत टेकनॉलॉजी की स्पष्ट  व्याख्या करना है। जब तक  नीतिगत पहलुओं को स्पष्ट  नहीं किया जाता प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  नहीं आएगा। नीतिगत अस्पष्टता  की वजह से मोदी सरकार रक्षा क्षेत्र के लिए रखे गए लगभग 50 अरब डॉलर के बजट को खर्च  तक नहीं कर पाई है। निसंदेह, भारत में रक्षा तकनीक की कमी है और यही कारण है कि सरकार को इसे सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदशी  निवेश  के लिए खोलना पडा है। तथापि सौ फीसदी विदेशी निवेश  के लिए नियम और शर्तें किस तरह तय की जाएंगी, यह बात ज्यादा अहम है। सौ फीसदी एफडीआई का पूरा-पूरा फायदा लेने के लिए नियम और शर्तें पूरी तरह से भारत के पक्ष में होनी चाहिए। जब तक नियम और  शर्तें  स्पष्ट नहीं  हो जातीं, तब तक यह कहना मुश्किल  है कि एफडीआई के आने से टेकनॉलॉजी ट्रांसफर का कितना फायदा होगा और भारत के लोगों को कितना रोजगार मिलेगा। बहरहाल, सुखद पहल हुई है और इससे उम्मीद है कि सुधारों को गति मिलेगी।