देश में कर अधिकारी का नाम सुनते ही बडे-बडों के भी पसीने छूट जाया करते हैं। इस पब्लिक अनफ्रेंडली छवि के लिए संबंधित कर विभाग खुद जिम्मेदार हैं। आम आदमी के साथ शालीन एव भद्र सलूक अपनाने की बजाए नौकरशाही अक्सर “ रुखा और सख्त“ व्यवहार दिखाती है और कई मर्तबा तो अफसर सीधे मुंह बात तक नहीं करते। कर विभाग (आयकर, आबकारी, सीमा शुल्क आदि) की तो बात ही छोडिए, जनकल्याण से सीधा जुडा सिविल प्रशासन भी आम आदमी की परवाह नहीं करता है। भारत में नौकरशाही आज भी फिरंगी शासन की संस्कृति में सराबोर है। राजसी कार्यशैली, रहन-सहन, खान-पान और वैसी ही मानसिकता। निजी सहायक आम आदमी को बडे साहब से मिलने ही नही देगा। आजादी के सात दशक बाद भी भारत “वेल्फेयर स्टेट“ की जगह “पुलिस स्टेट“ बना हुआ है। आयकर विभाग को लेकर तो आम आदमी के मन में उत्पीडन अथवा परेशान करने वाली छवि बनी हुई है। उस पर “करप्शन “ ने इस छवि को और दागदार बना दिया है। इन सब बातों के मद्देनजर प्रधानमंत्री नौकरशाही को “ आम आदमी“ फ्रेंडली बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। गत वीरवार को प्रधानमंत्री ने कर अधिकारियों को आम आदमी से “सीधे मुंह“ बात करने की नसीहत दी। प्रधानमंत्री ने “राजस्व ज्ञान संगम“ में कर अधिकारियों के कान में रेपिड (आरएपीआईडी)- रेवेन्यू, अकांटिबिलिटी, प्रोबिटी, इंफॉर्मेशन एंड डिजीटलाईजेशन- का मंत्र फूंकते हुए कहा कि इसी से करदाता और करउगहाता के बीच की खाई पाटी जा सकती है। भारत में अभी भी करदाताओं का दायरा काफी सीमित है और प्रधानमंत्री चाहते हैं कि जल्द ही यह दस करोड को पार कर जाना चाहिए। आयकर का दायरा बढेगा तो सरकार का राजस्व भी बढेगा। सवा सौ करोड से ज्यादा आबादी वाले देश में केवल एक फीसदी लोग आयकर अदा कर रहे हैं। अप्रैल माह में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सिस द्वारा जारी आंकडों के अनुसार 2012-13 के दौरान 2.87 करोड लोगों ने आईटी रिटर्न भरा था मगर इनमें 1.62 करोड ने कोई कर नहीं चुकाया। इस तरह उस साल मात्र 1.25 करोड लोगों ने आयकर अदा किया। इन आंकडों से साफ होता है कि देश में सिर्फ सर्विस क्लास से जुडे लोग आयकर अदा कर रहे हैं। एक करोड से ज्यादा आयकर अदा करने वालों की तादाद 5430 के करीब है जबकि 2014 में जारी आंकडे बताते हैं कि भारत में 1.98 अरबपति हैं। इससे साफ है कि अधिकतर अरबपति भी माकूल आयकर नहीं चुका रहे हैं। मौजूदा भारतीय परिवेश में आयकर दाताओं का दायरा बढाना आसान नहीं है । 18 से 58-60 साल तक की वर्किंग आबादी को ही आयकर के दायरे में लाया लाया जा सकता है। देश में 15 से 59 साल की वर्किंग आबादी लगभग 480 मिलियन (48 करोड) के करीब है मगर इन सब को आयकर दाता की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता। 180 मिलियन लोग कृषि से जुडे हैं और यह सेक्टर अभी आयकर दायरे से बाहर हैं। इसके अलावा 82 मिलियन कृषि कामगार हैं और 18 मिलियन घरेलू कामगार। ये श्रेणियों भी आयकर के दायरे से बाहर हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि 480 मिलियन की वर्किंग आबादी में 280 मिलियन आयकर के दायरे से ही बाहर है। इस तरह बाकी बचे 200 मिलियन पात्र लोगों मेंसे 58 फीसदी वर्किंग आबादी की कमाई रोजना दो रुपए से भी कम है। इसलिए यह 116 मिलियन आबादी भी आयकर से बाहर है। बच-बचाकर 84 मिलियन (8.40 करोड) वर्किंग आबादी आयकर के दायरे में आती है। इसमेंसे 2012-13 में 1.25 करोड आयकर दे रहे थे। इस स्थिति के दृष्टिगत ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा 7.15 करोड को ही कर दायरे में लाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने करदाताओं को यही लक्ष्य दिया है। बहरहाल, आयकर अदा नही करने वाली वर्किंग आबादी को आयकर दायरे में लाने के साथ-साथ काले धन को बाहर निकालना सरकार के समक्ष बडी चुनौती है। मोदी सरकार इस चुनौतौ से कैसे निपटती है, जनमानस की इस पर नजर है। और इसके लिए कर अधिकारियों को “सेवक“ बनना पडेगा।
सोमवार, 20 जून 2016
पीपल्स फ्रेंडली कर अधिकारी !
Posted on 8:21 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश में कर अधिकारी का नाम सुनते ही बडे-बडों के भी पसीने छूट जाया करते हैं। इस पब्लिक अनफ्रेंडली छवि के लिए संबंधित कर विभाग खुद जिम्मेदार हैं। आम आदमी के साथ शालीन एव भद्र सलूक अपनाने की बजाए नौकरशाही अक्सर “ रुखा और सख्त“ व्यवहार दिखाती है और कई मर्तबा तो अफसर सीधे मुंह बात तक नहीं करते। कर विभाग (आयकर, आबकारी, सीमा शुल्क आदि) की तो बात ही छोडिए, जनकल्याण से सीधा जुडा सिविल प्रशासन भी आम आदमी की परवाह नहीं करता है। भारत में नौकरशाही आज भी फिरंगी शासन की संस्कृति में सराबोर है। राजसी कार्यशैली, रहन-सहन, खान-पान और वैसी ही मानसिकता। निजी सहायक आम आदमी को बडे साहब से मिलने ही नही देगा। आजादी के सात दशक बाद भी भारत “वेल्फेयर स्टेट“ की जगह “पुलिस स्टेट“ बना हुआ है। आयकर विभाग को लेकर तो आम आदमी के मन में उत्पीडन अथवा परेशान करने वाली छवि बनी हुई है। उस पर “करप्शन “ ने इस छवि को और दागदार बना दिया है। इन सब बातों के मद्देनजर प्रधानमंत्री नौकरशाही को “ आम आदमी“ फ्रेंडली बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। गत वीरवार को प्रधानमंत्री ने कर अधिकारियों को आम आदमी से “सीधे मुंह“ बात करने की नसीहत दी। प्रधानमंत्री ने “राजस्व ज्ञान संगम“ में कर अधिकारियों के कान में रेपिड (आरएपीआईडी)- रेवेन्यू, अकांटिबिलिटी, प्रोबिटी, इंफॉर्मेशन एंड डिजीटलाईजेशन- का मंत्र फूंकते हुए कहा कि इसी से करदाता और करउगहाता के बीच की खाई पाटी जा सकती है। भारत में अभी भी करदाताओं का दायरा काफी सीमित है और प्रधानमंत्री चाहते हैं कि जल्द ही यह दस करोड को पार कर जाना चाहिए। आयकर का दायरा बढेगा तो सरकार का राजस्व भी बढेगा। सवा सौ करोड से ज्यादा आबादी वाले देश में केवल एक फीसदी लोग आयकर अदा कर रहे हैं। अप्रैल माह में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सिस द्वारा जारी आंकडों के अनुसार 2012-13 के दौरान 2.87 करोड लोगों ने आईटी रिटर्न भरा था मगर इनमें 1.62 करोड ने कोई कर नहीं चुकाया। इस तरह उस साल मात्र 1.25 करोड लोगों ने आयकर अदा किया। इन आंकडों से साफ होता है कि देश में सिर्फ सर्विस क्लास से जुडे लोग आयकर अदा कर रहे हैं। एक करोड से ज्यादा आयकर अदा करने वालों की तादाद 5430 के करीब है जबकि 2014 में जारी आंकडे बताते हैं कि भारत में 1.98 अरबपति हैं। इससे साफ है कि अधिकतर अरबपति भी माकूल आयकर नहीं चुका रहे हैं। मौजूदा भारतीय परिवेश में आयकर दाताओं का दायरा बढाना आसान नहीं है । 18 से 58-60 साल तक की वर्किंग आबादी को ही आयकर के दायरे में लाया लाया जा सकता है। देश में 15 से 59 साल की वर्किंग आबादी लगभग 480 मिलियन (48 करोड) के करीब है मगर इन सब को आयकर दाता की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता। 180 मिलियन लोग कृषि से जुडे हैं और यह सेक्टर अभी आयकर दायरे से बाहर हैं। इसके अलावा 82 मिलियन कृषि कामगार हैं और 18 मिलियन घरेलू कामगार। ये श्रेणियों भी आयकर के दायरे से बाहर हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि 480 मिलियन की वर्किंग आबादी में 280 मिलियन आयकर के दायरे से ही बाहर है। इस तरह बाकी बचे 200 मिलियन पात्र लोगों मेंसे 58 फीसदी वर्किंग आबादी की कमाई रोजना दो रुपए से भी कम है। इसलिए यह 116 मिलियन आबादी भी आयकर से बाहर है। बच-बचाकर 84 मिलियन (8.40 करोड) वर्किंग आबादी आयकर के दायरे में आती है। इसमेंसे 2012-13 में 1.25 करोड आयकर दे रहे थे। इस स्थिति के दृष्टिगत ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा 7.15 करोड को ही कर दायरे में लाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने करदाताओं को यही लक्ष्य दिया है। बहरहाल, आयकर अदा नही करने वाली वर्किंग आबादी को आयकर दायरे में लाने के साथ-साथ काले धन को बाहर निकालना सरकार के समक्ष बडी चुनौती है। मोदी सरकार इस चुनौतौ से कैसे निपटती है, जनमानस की इस पर नजर है। और इसके लिए कर अधिकारियों को “सेवक“ बनना पडेगा।






