सोशल मीडिया पर कालेधन को लेकर प्रधानमंत्री के भाषणों का आकलन करें , तो आपको वह भाषण (12 फरवरी, 2014) मिल जाएगा जिसमें नरेन्द्र मोदी ने विदेशों में छिपाए गए काले धन को स्वदेश लाकर हर आदमी के खाते में 15 लाख जमा कराने का वायदा किया था। यह भले ही चुनावी वायदा था मगर देश के आम आदमी ने इसे सच मान लिया और आज भी इसी मुगालते में जी रहा है। चुनाव जीतने के लिए समकालीन सियासी नेता आसमान से तारे तोडकर लाने का भी वायदा कर लेते हैं मगर अमल में बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधा तक मुहैया नहीं करा पाते। भाजपा ने सत्ता में आते ही हर कस्बे-गांव को चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराने का वायदा किया था मगर दो साल गुजर गए हैं, चौबीस घंटे तो क्या छह घंटे भी लगातार बिजली सप्लाई नहीं मिलती। इस गति से एक साल तो क्या देश में चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराने में कई साल लग सकते हैं। बहरहाल, इस रविवार को प्रधानमंत्री ने “ मन की बात“ कार्यक्रम में वाकई ही ऐसी बात कही जिस पर देश का हर प्रबुद्ध नागरिक उनसे सहमति रखता है। प्रधानमंत्री ने “मन की बात“ में कहा कि देश में लाखों लोगों के पास करोडों रुपए के बंगले है मगर आय पचास लाख से भी कम, इस पर भरोसा नहीं होता। संदर्भ अघोषित संपत्ति के खुलासे संबंधी सरकार की स्कीम का था। इस स्कीम के तहत 30 सितंबर अघोषित संपत्ति को घोषित करने की आखिरी तिथि है। इसके बाद सरकार सख्त कार्रवाई करेगी। केद्र सरकार इस तरह की स्कीम पहले भी कई बार लागू कर चुकी है मगर इसके कोई बहुत ज्यादा सकारात्मक परिणाम नहीं निकले हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि इस बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता है कि सवा सौ करोड की आबादी वाले देश में 50 लाख से ज्यादा आय वाले मात्र डेढ लाख ही होंगे जबकि हर छोटे-बडे शहर में लाखों नहीं तो हजारों के पास करोडों की संपत्ति है। आयकर विभाग को इस सच्चाई का पता है मगर फिर भी यह अघोषित संपत्ति सरकार की नजर से छिपती रही है। देश का करप्ट सरकारी तंत्र और साधन-सपन्न लोगों के उन्मुख न्यायिक व्यवस्था इसके लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। तीस सितंबर के बाद सरकार कर चोरों का पेन कार्ड ब्लॉक कर देगी, अखबारों में उनके नाम प्रकाशित किए जाएंगे, बैकों से लोन नहीं मिलेगा आदि जैसे उपाय प्रस्तावित है। मगर फौरी उपायों से कर चोरी को पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता। देश का सरकारी तंत्र इतना हो चुका है कि अपराधियों को रोकने की बजाय, वह उनकी मदद करता है। आयकर विभाग के पास पहले ही इस तरह के अधिकार हैं कि विभागीय अफसर करोंडों की संपत्ति के मालिक लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं और उनकी संपत्ति जब्त कर सकते हैं मगर अभी तक ऐसा नही हो रहा है। सरकार को अघोषित संपत्ति अथवा काला धन बाहर निकालने के लिए विशेष स्कीम चलानी पडे, यह अपने आप में संबंधित विभाग की अकुशलता का प्रमाण है। आयकर अधिकारी इस सच्चाई को बखूबी जानते हैं कि काला धन अर्जित कर काली संपत्ति जोडने वाले लोग रसूकदार होते हैं और उनका सियासत में तगडा दखल होता है। प्रधानमंत्री मोदी भी इस सच्चाई को जानते हैं कि देश में चुनाव भी इसी काले धन और अघोषित संपत्ति के बूते लडे जाते हैं। इन हालात में सरकार को फौरी अल्पकालीन उपाय करने की बजाए, दीर्घ-कालीन उपाय करने चाहिए ताकि देश में काले धन के पनपने और फलने-फूलने की कोई गुजाइंश ही न रहे। काले धन की उत्पति के लिए देश के कुछ “काले कानून“ प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। भला यह भी कोई आयकर छूट हुई कि दौ सौ रुपए किलो दाल और आसमान छूते मकान किराए के जमाने में मात्र तीन लाख रु सालाना आय अथवा इससे कम आय को कर से मुक्त रखा जाए। इस आय में तो मध्यम वर्ग अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी बमुश्किल जुटा सकता है। काले धन की उत्पति रोकने के लिए प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने की जरुरत है। अल्पकालीन उपाय बहुत ज्यादा असरदार नहीं हो सकते।
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