न्यायपालिका में अनुशासनहीनता
स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार तेलगांना के जज हतताल पर है। अब तक न्यायपालिक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, सिवा पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के जजों की एक दिन के सामूहिक अवकाश की घटना के। 2004 में पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट के 25 जज सामूहिक अवकाष पर चले गए थे। तेलंगाना के जजों की हडताल की प्रमुख वजह आंध्र प्रदेश से संबंधित 130 जजों की राज्य में नियुक्ति को लेकर उपजा विवाद है। हाइकोर्ट ने हाल ही में 130 जजों की नियुक्ति की थी। चयनित सभी जज क्योंकि आंध्र प्रदेश में जन्में है, इसलिए तेलंगाना के जज इन नियुक्तियो को अवैध मान रहे हैं। तेलंगाना के जजों का आरोप है कि भर्ती के समय आंध्र और तेलंगाना में जन्मे लोगों के अनुपात का पालन नहीं किया गया । हडताली जजों का यह भी आरोप है कि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में भी दोनों राज्यों के अनुपात (60ः40) का पालन नहीं किया गया है। हाईकोर्ट में कुल 21 जज हैं और इनमें सिर्फ तीन तेलंगाना के है। यहां भी अनुपात को सुधारने की जरुरत है। इससे कई बार राज्य से जुडे फैसले प्रभावित हो रहे हैं। विशेषतय, 2014 के बाद ऐसा देखा गया है। तेलंगाना के लिए अलग से हाईकोर्ट की माग की जा रही है। अभी आध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए एक ही हाईकोर्ट है। विरोध में तेलंगाना के दौ सौ जज 15 दिन की छुट्टी पर चले गए है। 125 जजों ने विरोधस्वरुप एसोसिएशन अध्यक्ष को अपने-अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं। हाईकोर्ट ने अनुशासनहीनता के लिए 11 जजों को निलंबित कर दिया है। निलबंन से तेलंगाना के न्यायिक अधिकारी और भडक गए हैं। तेलंगाना के वकील भी जजों के समर्थन में खडे हो गए है। यानी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की लडाई में अब जज भी शामिल हो गए हैं। इस मामले में दोनों राज्यों के बीच कटुता इस कद्र बढ गई है कि वारंगल में आंध्र प्रदेश में जन्मे एक जज को तेलंगाना छोडने तक के लिए कहा गया। अलग हाइकोर्ट को लेकर तेलंगाना और केन्द्र के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी जारी है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर के नाम से मशहूर) की सांसद पुत्री ने यह कहकर विवाद खडा कर दिया है कि आंध्र प्रदेश के जज तेलंगाना में जानबूझकर जगह (नियुक्ति) चुन रहे हैं ताकि नौकरशाही और पुलिस को परेशान किया जा सके। उधर, मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव केन्द्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड के इस बयान पर भडक गए हैं कि अलग हाईकोर्ट बनाने में केन्द्र की कोई भूमिका नहीं है। गौड के इस बयान में कोई दम नहीं है कि मुख्यमंत्री को अलग हाईकोर्ट स्थापित करने के लिए चीफ जस्टिस से बातचीत करनी चाहिए। अगर ऐसा होता तो हरियाणा कब का अपने लिए अलग हाई कोर्ट स्थापित कर चुका होता। संविधान में राज्य की विधानसभा को अपना अलग हाईकोर्ट स्थापित करने का अधिकार नहीं है हालांकि अनुछेच्द 214 के तहत हर राज्य के लिए अलग हाईकोर्ट की व्यवस्था है मगर ऐसा संसद ही कर सकती है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए संयुक्त हाईकोर्ट भी संसद द्वारा पारित कानून के तहत स्थापित किया गया है। बहरहाल, तेलंगाना के लिए अलग हाईकोर्ट बनाने से मौजूदा समस्या का हल निकल सकता है। तथापि, न्यायपालिका का क्षेत्र अथवा जात-पात पर बंटना बेहद दुखद है। न्याय की कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश नैसर्गिक न्याय की मूर्ति माना जाता है, न कि किसी क्षेत्र अथवा समुदाय विशेष का। तेलंगाना के हडताली जजों की मांग जायज हो सकती है मगर उनके विरोध का तरीका एकदम गलत है। न्यायाधीश कानून और व्यवस्था का सबसे बडा संरक्षक होता है। और अगर बाढ ही खेत को खाने लग जाए तो हो ली फसल। क्षेत्रीय आकांशाएं भी एक सीमा तक ही पूृरी की जा सकती हैं। देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली क्षेत्रीय आकांशाएं सहन नहीं की जा सकती। तेलंगाना के हडताली जजों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। देश में भेड चाल की रिवायत है। तेलंगाना की चिंगारी और राज्यों में भी भडक सकती है।
स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार तेलगांना के जज हतताल पर है। अब तक न्यायपालिक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, सिवा पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के जजों की एक दिन के सामूहिक अवकाश की घटना के। 2004 में पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट के 25 जज सामूहिक अवकाष पर चले गए थे। तेलंगाना के जजों की हडताल की प्रमुख वजह आंध्र प्रदेश से संबंधित 130 जजों की राज्य में नियुक्ति को लेकर उपजा विवाद है। हाइकोर्ट ने हाल ही में 130 जजों की नियुक्ति की थी। चयनित सभी जज क्योंकि आंध्र प्रदेश में जन्में है, इसलिए तेलंगाना के जज इन नियुक्तियो को अवैध मान रहे हैं। तेलंगाना के जजों का आरोप है कि भर्ती के समय आंध्र और तेलंगाना में जन्मे लोगों के अनुपात का पालन नहीं किया गया । हडताली जजों का यह भी आरोप है कि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में भी दोनों राज्यों के अनुपात (60ः40) का पालन नहीं किया गया है। हाईकोर्ट में कुल 21 जज हैं और इनमें सिर्फ तीन तेलंगाना के है। यहां भी अनुपात को सुधारने की जरुरत है। इससे कई बार राज्य से जुडे फैसले प्रभावित हो रहे हैं। विशेषतय, 2014 के बाद ऐसा देखा गया है। तेलंगाना के लिए अलग से हाईकोर्ट की माग की जा रही है। अभी आध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए एक ही हाईकोर्ट है। विरोध में तेलंगाना के दौ सौ जज 15 दिन की छुट्टी पर चले गए है। 125 जजों ने विरोधस्वरुप एसोसिएशन अध्यक्ष को अपने-अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं। हाईकोर्ट ने अनुशासनहीनता के लिए 11 जजों को निलंबित कर दिया है। निलबंन से तेलंगाना के न्यायिक अधिकारी और भडक गए हैं। तेलंगाना के वकील भी जजों के समर्थन में खडे हो गए है। यानी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की लडाई में अब जज भी शामिल हो गए हैं। इस मामले में दोनों राज्यों के बीच कटुता इस कद्र बढ गई है कि वारंगल में आंध्र प्रदेश में जन्मे एक जज को तेलंगाना छोडने तक के लिए कहा गया। अलग हाइकोर्ट को लेकर तेलंगाना और केन्द्र के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी जारी है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर के नाम से मशहूर) की सांसद पुत्री ने यह कहकर विवाद खडा कर दिया है कि आंध्र प्रदेश के जज तेलंगाना में जानबूझकर जगह (नियुक्ति) चुन रहे हैं ताकि नौकरशाही और पुलिस को परेशान किया जा सके। उधर, मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव केन्द्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड के इस बयान पर भडक गए हैं कि अलग हाईकोर्ट बनाने में केन्द्र की कोई भूमिका नहीं है। गौड के इस बयान में कोई दम नहीं है कि मुख्यमंत्री को अलग हाईकोर्ट स्थापित करने के लिए चीफ जस्टिस से बातचीत करनी चाहिए। अगर ऐसा होता तो हरियाणा कब का अपने लिए अलग हाई कोर्ट स्थापित कर चुका होता। संविधान में राज्य की विधानसभा को अपना अलग हाईकोर्ट स्थापित करने का अधिकार नहीं है हालांकि अनुछेच्द 214 के तहत हर राज्य के लिए अलग हाईकोर्ट की व्यवस्था है मगर ऐसा संसद ही कर सकती है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के लिए संयुक्त हाईकोर्ट भी संसद द्वारा पारित कानून के तहत स्थापित किया गया है। बहरहाल, तेलंगाना के लिए अलग हाईकोर्ट बनाने से मौजूदा समस्या का हल निकल सकता है। तथापि, न्यायपालिका का क्षेत्र अथवा जात-पात पर बंटना बेहद दुखद है। न्याय की कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश नैसर्गिक न्याय की मूर्ति माना जाता है, न कि किसी क्षेत्र अथवा समुदाय विशेष का। तेलंगाना के हडताली जजों की मांग जायज हो सकती है मगर उनके विरोध का तरीका एकदम गलत है। न्यायाधीश कानून और व्यवस्था का सबसे बडा संरक्षक होता है। और अगर बाढ ही खेत को खाने लग जाए तो हो ली फसल। क्षेत्रीय आकांशाएं भी एक सीमा तक ही पूृरी की जा सकती हैं। देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली क्षेत्रीय आकांशाएं सहन नहीं की जा सकती। तेलंगाना के हडताली जजों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। देश में भेड चाल की रिवायत है। तेलंगाना की चिंगारी और राज्यों में भी भडक सकती है।






