बॉम्बे हाई कोर्ट ने सेंसर बोर्ड (सेंटरल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) को उसकी औकात दिखा दी है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सेंसर बोर्ड का काम फिल्मों की काट-छांट करना नहीं, बल्कि उन्हें प्रमाणित करना है। न्यायपालिका ने यह व्यवस्था पंजाब की ज्वंलत समस्या नशाखोरी पर बनाई गई बालीवुड फिल्म “उडता पंजाब“ में सेंसर द्वारां मनमानी कैंची चलाने पर दी है। सेंसर बोर्ड ने पहले 89 कट लगाकर फिल्म का करीब-करीब सत्यानाश कर दिया था। बवाल उठने पर सेंसर बोर्ड 89 कट की जगह 13 पर सहमत हो गया मगर बॉम्बे हाई कोर्ट ने सिर्फ एक सीन पर कट की अनुमति देकर फिल्म को तय समय पर रिलीज होने की अनुमति दे दी। हाई कोर्ट ने सेंटरल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेषन को 48 घंटों के भीतर निर्माता अनुराग कश्यप को नया सर्टिफिकेट जारी करने के निर्देश दिए हैं। फिल्म 17 जून को रिलीज होनी है। लेकिन अभी भी फिल्म के रिलीज होने पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक के मामले की सुनवाई चल रही है और 16 जून को अगली सुनवाई होनी है। बहरहाल, “उडता पंजाब“ पर सेंसर बोर्ड की कैंची को लेकर देश में “क्रिएटिविटी“ को लेकर फिर बहस-मुहासिब शुरु हो गई है। अमूमन, सेंटरल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेषन (सेंसर बोर्ड) का मुखिया फिल्म जगत से जुडा होता है। इस बात के मद्देनजर बोर्ड से उम्मीद की जाती है कि वह निष्पक्ष और स्वतंत्र तौर पर काम करे और फिल्म निर्माताओं की समस्याओं को समझे। बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष पहजाल निहलानी खुद भी फिल्म निर्माता है मगर उन्होंने निष्पक्ष पर काम करने की बजाए खुद को प्रधानमंत्री का “चमचा“ साबित करने में अपना और देश का समय जाया किया हैं। देश के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री को किसी “चमचे“ या भक्त की जरुरत नहीं है, केन्द्रीय संचार मंत्री रवि संचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद को यह कहते हुए निहलानी को फटकार लगानी पडी है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि “उडता पंजाब“ के मामले में मोदी सरकार की खासी किरकिरी हुई है। जिस तरह से सेंसर बोर्ड ने फिल्म पर कैंची चलाने का प्रयास किया है, उससे साफ है कि इसके पीछे संसरशिप का मकसद कम, राजनीतिक स्वार्थ कहीं ज्यादा रहे हैं। पंजाब में अगले साल के शुरु में विधानसभा चुनाव होने हैं और “उडता पंजाब“ में ड्रग को लेकर सियासी दलों और निहित स्वार्थी तत्वों की कलई खोली गई है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले इस फिल्म का रिलीज होना सत्तारूढ गठबंधन शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के लिए शुभ नहीं माना जा रहा है। पंजाब में पिछले दस साल से अकाली दल-भाजपा सरकार सत्ता में है और आंकडे इस बात के गवाह हैं कि इस दौरान राज्य में ड्रग का अवैध कारोबार भरपूर फला-फूला है। “उडता पंजाब” पर सेंसर के बेतहाशा कट के पीछे असली वजह भी यही है। देश के सियासी दलों की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। विपक्ष में रहते सियासी दल जिन बातों के लिए सत्तारूढ दल को कोसा करते हैं, सत्ता में आते ही वही करते हैं। भारत में फिल्मों के सेंसरशिप का इतिहास बहुत पुराना नही है। 1921 में पहली बार फिरंगी शासन ने “भक्त विदूर“ पर कैंची चलाई थी क्योंकि फिल्म के पात्र महात्मा गांधी से काफी मिलते-जुलते थे। तत्कालीन फिरंगी शासक महात्मा गांधी से जुडे किसी भी मामले को सहन नहीं करते थे। सत्तहर के दशक में आपातकाल के दौरान फिल्म “ किस्सा कुर्सी का “ पर सेंसर बोर्ड की कैंची चलने पर तत्काकालीन जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) के नेताओं ने खूब हंगामा किया था। 1981 में फिल्म “मेरी आवाज सुनो“ को प्रदर्शित नहीं होने दिया गया। 1994 में फूलन देवी पर आधारित “बैंडिट क्वीन“ भी न्यायपालिका के दखल से ही रिलीज हो पाई थी । और भी कई फिल्में हैं जिन पर खासा विवाद रहा है मगर “किस्सा कुर्सी का“ को छोडकर इन सब फिल्मों की सेंसरशिप में राजनीतिक स्वार्थ नहीं था। “उडता पंजाब“ में राजनीतिक स्वार्थ है और बोर्ड अध्यक्ष निहलानी ने अपने कथन से यह स्पष्ट भी कर दिया है। बहरहाल, क्रिएटिविटी पर प्रहार देश हित में नहीं है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी साफ तौर पर कहा है, “ जब तक क्रिएटिविटी फ्रीडम का दुरुपयोग न हो, किसी हस्तक्षेप की जरुरत नहीं है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेश न का काम फिल्मों को सर्टिफिकेट जारी करना है, कैंची चलाना नहीं है।
बुधवार, 15 जून 2016
Its Now Central Board For Film Certification Not Censorship, Then Why Block Creativity ?
Posted on 8:04 pm by mnfaindia.blogspot.com/






